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Satna News: महोबा की अंजली लोहार ने लोकल 18 से कहा कि वह हंसिया, खुरपी, कुल्हाड़ी, तवा और खेती-किसानी के अन्य औजार बनाकर बेचती हैं. दिनभर भट्ठी पर काम करने और फिर बाजार में इन सामान की बिक्री दोनों जिम्मेदारियां वह खुद संभालती हैं.
सतना. भट्ठी की दहकती आग, धौंकनी की तेज आवाज और हथौड़े की लयबद्ध चोट के बीच गढ़ी जा रही है आत्मनिर्भरता की एक सशक्त कहानी. साल में एक न एक बार प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में गाड़िया लोहार समुदाय की महिलाएं खुले आसमान के नीचे अपनी अस्थायी दुकानें सजाकर पुश्तैनी हुनर को नया जीवन देती हैं. सदियों पुरानी यह कारीगरी केवल रोजगार का साधन नहीं बल्कि पहचान, संघर्ष और स्वाभिमान की विरासत भी है, जिसे नई पीढ़ी तक पहुंचाने का जिम्मा अब पूरा परिवार मजबूती से संभाल रहा है. गाड़िया लोहार समुदाय का इतिहास उस दौर से जोड़ा जाता है, जब चित्तौड़ एक स्वतंत्र सत्ता के रूप में प्रसिद्ध था. समुदाय के बुजुर्ग बताते हैं कि उनके पूर्वजों ने पलायन के बाद मध्य भारत के कई इलाकों में डेरा डाला और लोहे के औजार बनाकर आजीविका शुरू की. जिसके बाद पीढ़ी दर पीढ़ी यही काम चलता रहा.
90 वर्षीय बिना बेगम लोहार लोकल 18 को बताती हैं कि उन्होंने यह हुनर अपने पूर्वजों से सीखा और अब नई पीढ़ी को सिखा रही हैं. समय बदल गया है लेकिन काम वही है, लोहा पिघलाना फिर उसे आकार देना और जगह-जगह जाकर बेचना. पहले बैलगाड़ियों से सफर होता था, अब वाहन हैं लेकिन तंबू गाड़कर बाजार लगाने की परंपरा आज भी कायम है.
महिलाएं बनीं आत्मनिर्भरता
आज इस परंपरा को आगे बढ़ाने में महिलाओं की भूमिका सबसे अहम हो गई है. महोबा की अंजली लोहार बताती हैं कि वह हंसिया, खुरपी, तवा, कुल्हाड़ी और खेती-किसानी के अन्य औजार बनाकर बेचती हैं. दिनभर भट्ठी पर काम और फिर बाजार में बिक्री दोनों जिम्मेदारियां वह खुद संभालती हैं. बमीठा निवासी अनीता लोहार कहती हैं कि मुनाफा पहले जैसा नहीं रहा लेकिन यही उनका एकमात्र कौशल है. समुदाय के लिए यह सिर्फ धंधा नहीं बल्कि अस्तित्व का सवाल है. उनके बनाए औजार सस्ते और टिकाऊ माने जाते हैं, इसलिए ग्राहकों की कमी नहीं रहती.
बदलता वक्त और नई चुनौतियां
हालांकि बदलती अर्थव्यवस्था और बाजार की प्रतिस्पर्धा ने इस समुदाय की राह आसान नहीं छोड़ी है. युवा मंगल लोहार कहते हैं कि अब आगे की सोच जरूरी है. वह पढ़ाई भी कर रहे हैं और साथ ही पुश्तैनी काम में हाथ बंटा रहे हैं. उनका मानना है कि परंपरा को बचाने के लिए आधुनिक सोच और शिक्षा दोनों जरूरी हैं. सरकारी योजनाओं का लाभ सीमित रूप से मिलने की शिकायत भी सामने आती है. वहीं बुजुर्गों का कहना है कि अब बात सिर्फ कला बचाने की नहीं बल्कि भूख मिटाने की है.
सड़क किनारे सजा बाजार
इन दिनों छतरपुर के बिरला रोड स्थित संतोषी माता मंदिर के पास 8 से 10 परिवारों के करीब 40 सदस्य अस्थायी बाजार लगाए हुए हैं. खुले में सजी भट्ठियां और लोहे की चमकती वस्तुएं राहगीरों का ध्यान खींचती हैं. स्थानीय लोग बताते हैं कि यहां बाजार की तुलना में सस्ता और मजबूत सामान मिल जाता है.
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राहुल सिंह पिछले 10 साल से खबरों की दुनिया में सक्रिय हैं. टीवी से लेकर डिजिटल मीडिया तक के सफर में कई संस्थानों के साथ काम किया है. पिछले चार साल से नेटवर्क 18 समूह में जुड़े हुए हैं.
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