ईरान रोज कितनी मिसाइल्स बनाता है… ये किस तरह की होती हैं, कैसे बनती हैं

रिपोर्ट्स आ रही हैं कि इस युद्ध बेला में ईरान की मिसाइल बनाने की गति भी तेज हो गई है. वैसे क्या आपको मालूम है कि ईरान रोज कितनी मिसाइलें बनाता है. ये किस किस तरह की होती हैं. उसके जखीरे में कितनी मिसाइल्स हैं. ईरान के मिसाइल कार्यक्रम को लेकर हाल ही में कई अहम रिपोर्ट्स भी सामने आई हैं. हम आपको ये भी बताएंगे कि एक मिसाइल कैसे बनती है और कितना समय लेती है.

रिपोर्ट्स कहती हैं कि ईरान की मिसाइल उत्पादन दर स्थिर नहीं है. ये इस बात पर निर्भर करता है कि वह किस तरह की मिसाइल बना रहा है, ये शॉर्ट-रेंज है या मीडियम-रेंज.

औसतन रोज कितनी मिसाइल

मार्च 2026 में किए गए एक खुफिया आकलन के अनुसार, ईरान प्रति माह दर्जनों बैलिस्टिक मिसाइलें बनाने की क्षमता रखता है. जून 2025 के युद्ध के बाद ईरान ने अपनी उत्पादन गति को और तेज किया है. इस हिसाब से ये कहा जा सकता है कि ईरान औसतन 1 से 2 मिसाइल रोज बना रहा है. हालांकि युद्ध जैसी स्थितियों में ईरान अपनी असेंबली लाइनों को और तेज कर सकता है.

2026 की रिपोर्ट्स बताती हैं कि ईरान ने 2027 तक अपने भंडार को 8,000 मिसाइलों तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है. एक मिसाइल को तैयार होने में लगने वाला समय उसके ईंधन के प्रकार पर निर्भर करता है. हालांकि ये रिपोर्ट ये भी कहती है कि मार्च 2026 तक ईरान के स्टोरेज में अनुमानित तौर पर 2500 – 3000 मिसाइलें थीं. ईरान ने जमीन के नीचे सैकड़ों फीट गहरे “मिसाइल शहरों” में अपनी असेंबली लाइनें बना रखी हैं.

कितने तरह की मिसाइल्स

ईरान की फतेह-110 और जोल्फागर जैसी सॉलिड-फ्यूल मिसाइलों में ईंधन पहले से भरा होता है. इन्हें स्टोरेज से निकालकर लांच पैड पर लाने और फायर करने में केवल कुछ मिनट लगते हैं. इनकी मैन्युफैक्चरिंग भी लिक्विड-फ्यूल मिसाइलों की तुलना में तेज और आसान होती है.

शाहाब-3 और इमाद जैसी लिक्विड-फ्यूल मिसाइलों में लांच से ठीक पहले ईंधन भरना पड़ता है. इस प्रक्रिया में कई घंटे का समय लग सकता है. निर्माण के नजरिए से इनके इंजन और फ्यूल टैंक की असेंबली अधिक जटिल होती है.

इज़राइल और अमेरिका के पिछले साल हुए हमलों में सॉलिड फ्यूल बनाने के काम आने वाले कई प्लनेटरी मिक्सर नष्ट कर दिये गए थे लेकिन ईरान ने तेजी से इसे बहाल कर लिया.

ईरान के पास 300 किमी से लेकर 3000 किलोमीटर तक रेंज वाली बैलिस्टिक मिसाइलें हैं तो मीडियम रेंज वाली मिसाइलें भी, जिनकी रेंज 1500-2000 किमी है. कुछ को हाइपरसोनिक या मैन्युवरिंग वारहेड वाली बताया जाता है. उसके पास क्रूज मिसाइलें भी हैं, जो ज़मीन के बहुत करीब उड़ती हैं और ट्रैजेक्टरी को बदल सकती हैं; इनकी रेंज लगभग 3000 किमी तक बताई जाती है. ईरान ने अपनी सभी घरेलू बैलिस्टिक मिसाइलों को पूरी तरह अपग्रेड कर लिया है, जिसमें सटीकता, रेंज और सॉलिड फ्यूल तकनीक में सुधार शामिल है.

ईरान ने हाइपरसोनिक बैलिस्टिक मिसाइल क्लास भी विकसित कर ली हैं, जो बहुत तेज़ गति और भूमिगत मिसाइल‑सिटी से दागी जा सकती हैं. ये मिसाइल‑डिफेंस को चकमा देने की क्षमता रखती हैं.

मिसाइल फैक्ट्रियां कितने घंटे काम कर रहीं

ईरानी अधिकारियों के अनुसार, उनकी मिसाइल फैक्टरियां 24 घंटे काम कर रही हैं, उत्पादन लाइनें लगातार चल रही हैं. विशेषज्ञों के मुताबिक़ ईरान ने अब न केवल संख्या बढ़ाई है बल्कि गुणवत्ता भी बढ़ाई है, जिससे उसकी मिसाइल‑उत्पादन क्षमता सामरिक रूप से बहुत अधिक प्रभावी हो गई है. इस्फहान मिसाइल कॉम्प्लेक्स ईरान का ऐसा बड़ा केंद्र है जहां सॉलिड और लिक्विड फ्यूल ईंधन के साथ-साथ मिसाइल के कलपुर्जे बनाए जाते हैं. सेमनान और करमानशाह में मिसाइलों का परीक्षण और असेंबली की जाती है.

कितनी बड़ी वर्कफोर्स

ईरान के मिसाइल कार्यक्रम का नेतृत्व मुख्य रूप से दो संगठन करते हैं – एयरोस्पेस इंडस्ट्रीज आर्गनाइजेशन यानिए AIO और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स. एआईओ रक्षा मंत्रालय के अधीन है, इसमें हजारों इंजीनियर, वैज्ञानिक और तकनीकी कर्मचारी काम करते हैं. वहीं इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स ईरान की सबसे शक्तिशाली सैन्य शाखा है, जो अपनी “सेल्फ-सफिशिएंसी जिहाद ऑर्गनाइजेशन” के जरिए रिसर्च और डेवलपमेंट को संभालती है.

विशेषज्ञों के अनुसार, इस पूरे इकोसिस्टम में सीधे और अप्रत्यक्ष रूप से 50,000 से अधिक लोग लगे हुए हैं, जिनमें टॉप-लेवल के रॉकेट साइंटिस्ट से लेकर टनल बनाने वाले मजदूर तक शामिल हैं.

कहां से आता है कच्चा माल

ईरान ने दशकों के प्रतिबंधों के कारण अपनी एक स्वतंत्र सप्लाई चेन विकसित कर ली है. मार्च 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, चीन ईरान को ‘प्लैनेटरी मिक्सर’ और ईंधन बनाने के लिए जरूरी रसायनों का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता है. रूस तकनीक और सैटेलाइट गाइडेंस में मदद करता है. ईरान ने उत्तर कोरियाई और रूसी डिजाइनों की रिवर्स इंजीनियरिंग करके अपनी खुद की तकनीक विकसित की है.

ईरान दुनिया भर से मिसाइल के संवेदनशील पुर्जे जैसे सेंसर, इलेक्ट्रॉनिक चिप्स और टरबाइन इंजन मंगाने के लिए नकली कंपनियों के नेटवर्क का इस्तेमाल करता है ताकि प्रतिबंधों से बचा जा सके.

ईरान अब अपने मिसाइल एयरफ्रेम के लिए हल्के कंपोजिट मटेरियल का निर्माण खुद करने लगा है, जिससे मिसाइलों की मारक क्षमता और रेंज बढ़ गई है.

कौन से देश मिसाइल्स बनाने में आगे

ईरान कम लागत वाली बैलिस्टिक मिसाइलें और “कामिकेज़” (आत्मघाती) ड्रोन बहुत बड़ी तादाद में बनाता है. उत्तर कोरिया भी परमाणु क्षमता वाली बड़ी मिसाइलें बहुत तेजी से असेंबल कर रहा है. चीन के पास दुनिया की सबसे बड़ी और आधुनिक ‘मिसाइल फैक्ट्री’ है. 2026 की रिपोर्ट्स के मुताबिक, चीन के पास 300 से अधिक इंटरकॉन्टिनेंटल मिसाइलें हैं. वह हर साल सैकड़ों की संख्या में नई मिसाइलें अपने बेड़े में शामिल कर रहा है.

तकनीक और स्पीड में ईरान जहां संख्या पर ध्यान देता है, वहीं ये देश क्वालिटी और मारक क्षमता में टॉप पर हैं. ईरान की रणनीति ये है कि अगर दुश्मन के पास एक महंगी डिफेंस मिसाइल है, तो मैं 50 सस्ती मिसाइलें एक साथ दागूंगा ताकि उनका सिस्टम फेल हो जाए.

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