Satna News: घरेलू हिंसा, मानसिक प्रताड़ना और पारिवारिक विवादों की पीड़ा अक्सर घर की चारदीवारी में ही दम तोड़ देती है. कई महिलाएं समाजिक दबाव, आर्थिक निर्भरता और पारिवारिक भय के कारण अपनी आवाज उठाने से कतराती हैं. ऐसे माहौल में जिले का वन स्टॉप सेंटर सखी उन महिलाओं के लिए उम्मीद की किरण बनकर उभरा है जिन्हें सुरक्षा, सहारा और संवेदनशील सुनवाई की जरूरत है.
महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा संचालित यह केंद्र हिंसा से प्रभावित महिलाओं और बालिकाओं को एक ही छत के नीचे समग्र सहायता उपलब्ध करा रहा है. यहां आने वाली हर पीड़िता को गोपनीय, सुरक्षित और सहानुभूतिपूर्ण वातावरण में सुना जाता है, ताकि वह बिना किसी डर के अपनी बात रख सकें और न्याय की दिशा में आगे बढ़ सकें.
2016 से लगातार सक्रिय
धवारी स्थित वन स्टॉप सेंटर ‘सखी’ जुलाई 2016 से निरंतर संचालित है और यह सप्ताह के सातों दिन और 24 घंटे खुला रहता है. केंद्र में प्रशासक नीता श्रीवास्तव के नेतृत्व में एक काउंसलर, दो केस वर्कर, एक आईटी वर्कर, तीन बहुउद्देशीय सहायक और तीन सुरक्षा गार्ड तैनात हैं. महिला बाल विकास अधिकारी राजीव सिंह ने लोकल 18 को बताया कि यह केंद्र मिशन शक्ति-संबल के अंतर्गत कार्य कर रहा है, जिसका उद्देश्य हिंसा से प्रभावित महिलाओं को त्वरित और समग्र सहायता प्रदान करना है.
इतनी सुविधाएं उपलब्ध
केंद्र में आपातकालीन सहायता, प्राथमिक चिकित्सा, पुलिस समन्वय, कानूनी सलाह, मनोवैज्ञानिक परामर्श और सात दिनों तक शॉर्ट स्टे आश्रय की सुविधा उपलब्ध कराई जाती हैं. जरूरत पड़ने पर पीड़िता को मुख्यमंत्री महिला सशक्तिकरण योजना सहित अन्य योजनाओं से जोड़कर आर्थिक आत्मनिर्भरता की दिशा में भी प्रयास किए जाते हैं.
स्वाधार गृह की भी व्यवस्था
वहीं लोकल 18 को जानकारी देते हुए प्रशासक वन स्टॉप सेंटर नीता श्रीवास्तव ने बताया, भारत सरकार द्वारा 1 अप्रैल 2015 से पूरे देश के सभी जिलों में वन स्टॉप केंद्र (सखी) स्थापित करने की योजना निर्भया फंड के माध्यम से प्रारंभ की गई थी. यदि कोई मामला गंभीर होता है और महिला को दीर्घकालीन संरक्षण की आवश्यकता होती है तो उसे स्वाधार गृह भेजने की व्यवस्था भी की जाती है. 0 से 18 वर्ष तक की बालिकाएं बाल कल्याण समिति (सीडब्ल्यूसी) के माध्यम से यहां पहुंचती हैं, जबकि 18 वर्ष से अधिक आयु की महिलाओं को सीधे आश्रय सुविधा प्रदान की जाती है.
कैसे होती है काउंसलिंग?
नीता बताती हैं कि केंद्र में आने वाली प्रत्येक महिला की सबसे पहले व्यक्तिगत काउंसलिंग की जाती है. इसके बाद आवेदन लिया जाता है जिसमें आवश्यक दस्तावेज जैसे फोटो और पहचान पत्र शामिल होते हैं. इसके बाद तीन चरणों में काउंसलिंग की प्रक्रिया संचालित होती है. सबसे पहले दोनों पक्षों को अलग-अलग बुलाकर उनकी बात सुनी जाती है. फिर परिवार के अन्य सदस्यों से चर्चा की जाती है. अंत में दोनों पक्षों को आमने सामने बैठाकर समझौते का प्रयास किया जाता है. कुछ जटिल मामलों में यह प्रक्रिया चार से छह महीने तक चलती है. यदि समझौता संभव नहीं होता तो महिला को विधिक सहायता और घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत कार्रवाई की दिशा में मार्गदर्शन दिया जाता है. गंभीर मामलों में टीम पुलिस के सहयोग से रेस्क्यू अभियान भी चलाती है, जो महिलाएं यहां से समझौते के बाद घर लौटती हैं, उनका फॉलोअप भी किया जाता है, ताकि भविष्य में फिर से हिंसा की स्थिति न बने.
181 हेल्पलाइन से सीधी जुड़ाव की सुविधा
महिलाएं स्वयं केंद्र तक पहुंच सकती हैं या 112 हेल्पलाइन, पुलिस, डॉक्टर, विधिक परामर्शदाता, गैर-सरकारी संगठनों अथवा किसी जागरूक नागरिक के माध्यम से भी यहां लाई जा सकती हैं. 181 महिला हेल्पलाइन के माध्यम से की गई कॉल सीधे सिस्टम के जरिए केंद्र तक पहुंचती हैं. इसके बाद टीम तुरंत संपर्क कर आवश्यक कार्रवाई शुरू करती है.
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