Anarasa Recipe: त्योहार आते ही घर में मिठाइयों की खुशबू जैसे रिश्तों को भी मीठा कर देती है. बाजार की चमकदार मिठाइयों के बीच एक ऐसी पारंपरिक मिठाई भी है, जो कभी हर घर की पहचान हुआ करती थी-अनरसा. खासकर होली और पर इसे बनाना परंपरा का हिस्सा था, लेकिन वक्त की भागदौड़ में यह मिठाई धीरे-धीरे किचन से गायब होने लगी. वजह भी साफ है-इसका तरीका थोड़ा धैर्य मांगता है. मगर जो लोग इसे सही तरीके से बनाना जानते हैं, वे मानते हैं कि इसका स्वाद किसी भी मॉडर्न मिठाई को पीछे छोड़ देता है. अच्छी बात यह है कि थोड़ा ध्यान और सही प्रोसेस अपनाकर आज भी घर में वही पुराना, खस्ता-सॉफ्ट अनरसा बनाया जा सकता है.
अनरसा: धैर्य से बनती है असली मिठास
अनरसा कोई इंस्टेंट मिठाई नहीं है. इसमें चावल को लंबे समय तक भिगोना और आटे को फर्मेंट होने देना सबसे अहम स्टेप है. पुराने समय में दादी-नानी इसे 2-3 दिन पहले से तैयार करना शुरू कर देती थीं. असल में अनरसा का स्वाद उसके फर्मेंटेशन से आता है. चावल जितना अच्छे से भीगे और हल्का खमीर उठे, मिठाई उतनी ही सॉफ्ट और जालीदार बनती है.
48 घंटे भीगे चावल क्यों जरूरी
फर्मेंटेशन ही असली ट्रिक
चावल को कम से कम 48 घंटे भिगोना अनरसा की पहचान है. इस दौरान हर 12 घंटे में पानी बदलना जरूरी माना जाता है. इससे चावल हल्के खट्टे-फर्मेंटेड हो जाते हैं. गृहिणियों का अनुभव कहता है कि जल्दबाजी में 4-5 घंटे भिगोकर बनाया अनरसा अक्सर सख्त हो जाता है. वहीं सही तरीके से भीगा चावल उंगलियों से दबाते ही मैश हो जाता है-यही सही स्टेज है.
आटा बनाने की प्रक्रिया: नमी ही राज
भीगे चावल को पूरी तरह सुखाना नहीं होता, बस हल्का सा सूखा करना होता है. इसमें थोड़ी नमी रहना जरूरी है. इसके बाद बारीक पीसकर चावल का आटा बनाया जाता है और उसमें आधी मात्रा में पिसी चीनी मिलाई जाती है. यही मिश्रण अनरसा का बेस होता है. दिलचस्प बात यह है कि इस आटे को 7 दिन तक बाहर और लगभग 2 महीने तक फ्रिज में रखा जा सकता है-बस शर्त यह कि चीनी मिलाकर ही स्टोर किया जाए.
डो को आराम देना क्यों जरूरी
8 से 24 घंटे का इंतजार
आटे को दूध से गूंथने के बाद तुरंत अनरसा नहीं बनाया जाता. इसे कम से कम 7-8 घंटे या बेहतर हो तो 24 घंटे तक ढककर रखना चाहिए. इस दौरान डो में हल्का खमीर आता है. यही कारण है कि तलने पर अनरसा फूलता है और अंदर से सॉफ्ट रहता है.
तलने की कला: एक तरफ से ही सिकता है अनरसा
अनरसा की सबसे अलग पहचान यही है कि इसे पलटकर नहीं तला जाता. हल्के गरम घी में इसे धीरे-धीरे एक ही तरफ से पकाया जाता है और ऊपर से घी डालकर सेकते हैं. तलते समय अनरसा का आकार थोड़ा असमान रहता है-कहीं फूलता, कहीं हल्का दबा. यही उसकी असली पहचान है.
त्योहारों की यादें और अनरसा
कई परिवारों में आज भी होली से कुछ दिन पहले महिलाएं मिलकर अनरसा बनाती हैं. बच्चे खसखस लगे इन गोल-मटोल टुकड़ों को देखकर उत्साहित हो जाते हैं. ग्रामीण इलाकों में यह मिठाई मेहमानों को खास तौर पर खिलाई जाती थी-क्योंकि इसे बनाने में समय और मेहनत लगती है. इसलिए इसे सम्मान की मिठाई भी माना जाता था.
सही अनरसा के लिए पारंपरिक टिप्स
-चावल का चुनाव
छोटा, मोटा कच्चा चावल लें-बासमती नहीं.
-चीनी का अनुपात
जितना चावल, उसकी आधी चीनी.
-भिगोने का समय
48 घंटे जरूरी, 72 घंटे बेहतर.
-डो का फर्मेंटेशन
कम से कम 8 घंटे, बेहतर 24 घंटे.
-तलने का माध्यम
सिर्फ घी-तभी असली स्वाद आता है.
-धीरे-धीरे लौट रही है पारंपरिक मिठाई
आजकल सोशल मीडिया और कुकिंग चैनलों की वजह से लोग फिर से पारंपरिक मिठाइयों की ओर लौट रहे हैं. अनरसा भी उन्हीं में से एक है. कई युवा अब त्योहारों पर घर की मिठाई बनाने को ट्रेंड मानते हैं. ऐसे में अनरसा फिर से रसोई में जगह बना रहा है-पुरानी यादों और असली स्वाद के साथ.
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