लोन गारंटर की जवाबदेही पर सुप्रीम कोर्ट का आया बड़ा फैसला, जानें क्या है पूरा मामला?

Supreme Court on loan guarantor: लोग अकसर अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए लोन का सहारा लेते हैं. इसके लिए गारंटर की भी जरूरत पड़ती है.गारंटर वह इंसान होता है, जो लोन के भुगतान की गारंटी देता है. अकसर दोस्त या रिश्तेदार के लिए गारंटर बन जाने की रिक्वेस्ट आती है. भरोसा दिलाया जाता है कि यह महज एक फॉर्मेलिटी है. हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में लोन गारंटर की जवाबदेही को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है.आइए इस पर डिटेल में जानते हैं कि मामला क्या है? 

NCLAT के पुराने फैसले को किया खारिज

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (26 फरवरी) को कहा कि Insolvency and Bankruptcy Code 2016 के तहत एक ही कर्ज के लिए मुख्य उधारकर्ता और कॉर्पोरेट गारंटर के खिलाफ एक साथ CIRP (Corporate Insolvency Resolution Process) शुरू करने पर कोई रोक नहीं है. फैसले में बताया गया कि भारतीय अनुबंध अधिनियम (Indian Contract Act) की धारा 128 के तहत लोन पर गारंटर की भी जिम्मेदारी कर्ज लेने वाले के समान ही होती है. जस्टिस दीपांकर दत्ता और ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने विष्णु कुमार अग्रवाल बनाम पीरामल एंटरप्राइजेज मामले में दिए गए NCLAT के पुराने फैसले को सही न मानते हुए खारिज कर दिया. 

अब बैंक को पैसा वसूलने में राहत

इसमें कहा गया था कि अगर एक ही कर्ज के लिए एक गारंटर के खिलाफ CIRP शुरू हो चुकी है, तो उसकी कर्ज के लिए दूसरे गारंटर या मुख्य उधारकर्ता के खिलाफ दूसरी याचिका दायर नहीं की जा सकती. इसे एक ही गलती की दो सजा के बराबर माना गया. कोर्ट ने कहा कि अब बैंक एक ही समय में उधारकर्ता और सभी गारंटरों के खिलाफ अलग-अलग CIRP चला सकती है. कोर्ट का मानना है कि लोन की जिम्मेदारी गारंटर की भी होती है इसलिए जब तक बैंक को उसके हिस्से का पूरा पैसा नहीं मिल जाता, वह हर उस शख्स का दरवाजा खटखटा सकता है, जिसने लोन की गारंटी दी थी.

पहले नियम के तहत अगर एक ही कर्ज के लिए दो लोगों ने गारंटी दी थी, तो बैंक एक बार में एक ही के खिलाफ कोर्ट जा सकता था. इससे बैंक को पैसा वसूलने में सालों लग जाते थे क्योंकि उसके पास एक-एक कर ही कानूनी कार्रवाई करने का अधिकार था. अब ऐसा नहीं होगा. नए नियम के तहत, अब बैंक डिफॉल्ट होने की स्थिति में एक ही दिन में कर्ज लेने वाले व्यक्ति, पहले गारंटर और दूसरे गारंटर यानी कि तीनों एक एक साथ केस कर सकता है. सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला बैंक और वित्तीय संस्थानों के लिए राहत की बात है. 

लोन गारंटर की बढ़ीं मुश्किलें

पहले लोन गारंटर यह सोचकर निश्चिंत रहते थे कि जब तक डिफॉल्ट हो चुकी कंपनी को लेकर CIRP का मामला सुलझ नहीं जाता है, तब तक चिंता की कोई बात नही है. लेकिन अब अगर कंपनी बिक भी गई, तो बैंक प्रमोटर की संपत्ति जब्त करने की कार्यवाही NCLT में शुरू कर सकता है. मान लीजिए कि अगर कंपनी के बिकने के बाद भी बैंक का कर्जवसूल नहीं हो पाता है, तो बैंक बचा हुआ पैसा वसूलने के लिए प्रमोटर्स के घरों का दरवाजा खटखटा सकते हैं. बैंक चाहे तो आपके फिक्स्ड डिपॉजिट, अकाउंट बैलेंस, म्यूचुअल फंड्स, कमर्शियल प्रॉपर्टी को कुर्क कर अपने हुए नुकसान की भरपाई कर सकता है.

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