Chhatarpur News. छतरपुर की चंदू बाई 85 साल की हो गई हैं. उन्हें किसी भी तरह की बीमारी नहीं है. आज भी वह सुबह 4 बजे उठती हैं. पैदल चलती हैं. खुद अपना भोजन बना लेती हैं और सबसे बड़ी तो ये वो 14 बार प्रयागराज का माघ मेला नहा चुकी हैं. हाल ही में बीते प्रयागराज माघ मेला 2026 में भी वह गई थीं. कड़ाके की ठंड में गंगा स्नान करके स्वस्थ छतरपुर लौटी हैं. उनका मानना है कि वह बूढ़ी नहीं हैं, इसलिए वह किसी पर निर्भर नहीं हैं. वह बताती हैं कि मेरी यही इच्छा रहती है कि मैं अपने छोटे-छोटे काम खुद करूं, किसी पर निर्भर न रहूं.
हर साल 1 महीने तक गंगा स्नान
जहां 85 साल की उम्र में लोग बिस्तर पकड़ लेते हैं, वहीं चंदू बाई हर साल अकेले 1 महीने तक गंगा स्नान करती हैं. अपने घर से सैकड़ों किलोमीटर दूर प्रयागराज में गंगा मईया के चरणों में रहकर माघ माह की कड़कड़ाती ठंड में गंगा स्नान करती हैं. यह सिलसिला 14 साल से जारी है. हालांकि, इनका शय्या दान भी हो गया है, लेकिन इसके बाद भी ये गंगा स्नान करती हैं.
14 साल से नहीं टूटा नियम
छतरपुर में खजुराहो की रहने वाली चंदू बाई त्रिवेदी ने लोकल को बताया, साल 2013 से प्रयागराज में हर साल माघ माह में गंगा स्नान कर रही हूं. एक महीने तक गंगा किनारे तंबुओं में रहकर तपस्या, साधना और व्रत कर कल्पवास करती हूं. भले ही मेरी उम्र 85 साल है. लेकिन अभी तक मेरा स्नान खंडित नहीं हुआ है. मैं हर साल माघ मेला नहाती हूं. 14 से एक भी साल नहाना खंडित नहीं हुआ है.
अम्मा का ये खान-पान
चंदू बाई बताती हैं कि मैं इस उम्र में चल-फिर लेती हूं. खाने में सबकुछ खाती हूं. दूध-घी, छाछ से लेकर दलिया और रोटी सब खाती हूं. हम पहले मोटा अनाज खाते थे. गेहूं की रोटी नहीं खाते थे. लेकिन, इसके बाद धीरे-धीरे गेहूं की रोटी खाने लगे तो उसमें चना मिलाकर आटा बनवाते थे. फिर इसकी रोटियां खाते थे. आज भी मैं भरपेट रोटी, दलिया, दूध-घी सब खाती हूं.
खुद करती हैं अपने काम
आगे बताया, उम्र के इस पड़ाव में भी अपने हाथ से खाना बना लेती हूं. भोजन के लिए मुझे किसी दूसरे पर आश्रित नहीं रहना है. साथ ही अपने कपड़े भी धो लेती हूं. अपनी दिनचर्या के सभी काम करती हूं. फिर अपने भगवान की भक्ति करती हूं. जिसका टाइम पास नहीं होता है, वह मेरे पास आ जाता है, क्योंकि मेरा बतियाने का स्वभाव है. मेरा एक बार मुंह चला तो फिर मैं बोलती ही रहती हूं.
लिखना पढ़ना नहीं आता
चंदा बाई बताती हैं, मुझे 1 से 10 तक की संख्या ही आती है. मैं न लिख पाती हूं और न पढ़ पाती हूं. अंग्रेजों का जमाना था तो पहले लड़कियों को पढ़ाया नहीं जाता था. क्योंकि अंग्रेज पढ़ी-लिखी लड़कियों को अपने साथ ले जाते थे. इसी डर से हमारे माता-पिता ने भी हमें नहीं पढ़ाया.
मोबाइल से करती हैं संपर्क
आगे बताया, मेरे पास एक की-पैड मोबाइल है. इसी मोबाइल से परिवार और रिश्तेदारों से बातचीत कर लेती हूं. हालांकि, मुझे फोन उठाना ही आता है. मैं किसी को फोन लगा नहीं पाती हूं.
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