बेगूसराय: क्या आप शादी करने की सोच रहे हैं? तो ये खबर आपके लिए बेहद काम की हो सकती है. शादी को लेकर हमारे समाज में एक लंबी परंपरा रही है. कुंडली मिलान, ग्रह-नक्षत्र, रीति-रिवाज और सामाजिक मान्यताएं. लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि इन सबके बीच एक ऐसा मिलान भी है, जो अगर न हो तो बाकी सब बेअसर हो सकता है? इसका उदाहरण आम लोगों से लेकर डॉक्टर, IAS, IPS जैसे उच्च पदों पर बैठे लोगों के असफल वैवाहिक संबंधों में भी देखने को मिलता है. महिला थाना में रोज आ रही शिकायतें भी यही संकेत देती हैं. कुंडली तो मिल गई, लेकिन मनोविज्ञान नहीं मिला. अब यहीं से शुरू होता है असली सस्पेंस. देखिए रिपोर्ट.
बिहार के जाने-माने मनोवैज्ञानिक और एसोसिएट मेंबर ऑफ द इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियर्स, इंडिया Er R. Shankar ने लोकल 18 से बातचीत में बताया कि विवाह दो शरीरों का नहीं, दो व्यक्तित्वों का मिलन है. सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या दोनों ‘मै’ से ‘हम’ बनने को तैयार हैं? यानी क्या दोनों अपने अहं से ऊपर उठकर रिश्ते को प्राथमिकता दे सकते हैं?
शादी में मनोविज्ञान का मिलान सबसे जरूरी
उन्होंने कहा कि समर्पण का अर्थ खुद को मिटा देना नहीं है, बल्कि संबंध के प्रति प्रतिबद्ध रहना है. कठिन परिस्थितियों में भी साथ निभाने की मानसिक तैयारी ही रिश्ते की असली मजबूती है. यहां यह भी जरूरी है कि दोनों के जीवन के उद्देश्य एक-दूसरे से टकरा तो नहीं रहे. अगर एक स्थिर जीवन चाहता है और दूसरा हर समय जोखिम और बदलाव की ओर झुका है, तो भविष्य में टकराव की संभावना बढ़ जाती है. लेकिन अगर अलग-अलग फोकस होने के बावजूद एक साझा दिशा बन रही है, तो यह बेहद सकारात्मक संकेत है.
लक्ष्य और सोच का संतुलन
Er R. Shankar के अनुसार, सुखद वैवाहिक जीवन के लिए यह देखना जरूरी है कि क्या दोनों समर्पित हो सकते हैं. चाहे लड़का हो या लड़की, क्या वे एक-दूसरे के साथ तालमेल बिठाने को तैयार हैं? क्या उनके फोकस, करियर प्लान और जीवन की प्राथमिकताएं एक-दूसरे से मेल खाती हैं या भविष्य में मेल खा सकती हैं? अगर दोनों का विजन बिल्कुल अलग है और कोई साझा रास्ता नहीं बन रहा, तो आगे चलकर तनाव बढ़ सकता है. इसलिए शादी से पहले भावनात्मक और मानसिक स्तर पर बातचीत बेहद जरूरी है.
मानसिक संतुलन है सबसे संवेदनशील पहलू
तीसरा और सबसे अहम पक्ष है मानसिक संतुलन. अगर किसी का स्वभाव अत्यधिक इरिटेबल है, छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा आता है, व्यक्तित्व अस्थिर है, इगो बहुत ज्यादा है या किसी प्रकार का मानसिक असंतुलन है, तो यह शादी के बाद बड़ी समस्या बन सकता है. साफ सोच, भावनात्मक परिपक्वता और संवाद की क्षमता ही रिश्ते को स्थायित्व देती है.
गुड न्यूज़ यह है कि ये सभी गुण सीखे और विकसित किए जा सकते हैं. समर्पण, संवाद कौशल और ईगो कंट्रोल अभ्यास से मजबूत होते हैं. जरूरत पड़ने पर काउंसलिंग भी मददगार साबित हो सकती है.
इसलिए शादी से पहले सिर्फ कुंडली मिलान नहीं, बल्कि खुद से यह सवाल जरूर पूछिए. क्या मैं ‘मैं’ से ‘हम’ बनने को तैयार हूं? अगर दोनों का जवाब हां है और सोच, लक्ष्य व मानसिक संतुलन का तालमेल बैठ रहा है, तो समझिए सुखमय वैवाहिक जीवन की नींव मजबूत है. यही है उस सस्पेंस का असली राज, जो हर सफल शादी के पीछे छिपा होता है.
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