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पूर्वांचल के ग्रामीण अंचलों में अर्जुन की छाल का इस्तेमाल मसूड़ों की सूजन और दांतों की सड़न रोकने के लिए किया जाता है. आयुर्वेदिक विशेषज्ञ डॉ. हर्षवर्धन के अनुसार, इसमें मौजूद ‘कषाय’ और प्राकृतिक एंटी-सेप्टिक तत्व मसूड़ों को मजबूत बनाते हैं और कीटाणुओं का नाश करते हैं. खेतों में काम करने वाले माली शिववचन का दावा है कि सिर्फ 2-3 दिन के नियमित कुल्ला से पायरिया जैसी समस्याओं में राहत मिलती है, आधुनिक शोध भी इसके एंटी-इंफ्लेमेटरी गुणों की पुष्टि करता है.
गाजीपुर. पूर्वांचल के ग्रामीण अंचलों में आज भी असाध्य बीमारियों का इलाज खेत-खलिहानों में मौजूद औषधियों से किया जाता है. हाल ही में एक खास पड़ताल के दौरान, गाजीपुर के कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) परिसर में पेशे से माली शिववचन ने अर्जुन के पेड़ की छाल को छीलकर उसका सजीव प्रदर्शन किया. इस पारंपरिक ज्ञान पर मुहर लगाते हुए आयुर्वेदिक चिकित्सक डॉ. हर्षवर्धन ने बताया कि मसूड़ों से मवाद आने और दांतों की सड़न रोकने में अर्जुन की छाल किसी रामबाण से कम नहीं है.
मसूड़ों के लिए क्यों है अचूक?
डॉ. हर्षवर्धन के अनुसार, अर्जुन की छाल में ‘कषाय’ यानी कसैलापन होता है. यह मसूड़ों के ढीलेपन को खत्म कर उन्हें जकड़ने (Tightening) का काम करता है. आयुर्वेद में इसे प्राकृतिक एंटी-सेप्टिक माना गया है, जो मुंह के भीतर पनपने वाले हानिकारक कीटाणुओं का नाश करता है.
मैदानी तरीका कैसे करें इस्तेमाल?
खेतों में काम करने वाले शिववचन ने अपने पुश्तैनी ज्ञान को साझा करते हुए बताया कि अर्जुन की ताजी छाल को साफ पानी से धोकर छोटे टुकड़ों में काट लें. इसे पानी में डालकर थोड़ा नमक मिलाएं और अच्छी तरह उबालें. जब यह काढ़ा गुनगुना रह जाए, तो इससे कुल्ला करें. शिववचन का दावा है कि मात्र 2-3 दिनों के नियमित इस्तेमाल से मसूड़ों की सूजन और पायरिया जैसी समस्याओं में बड़ा आराम मिलता है.
विज्ञान और रिसर्च की कसौटी
आधुनिक शोध भी इस ग्रामीण ज्ञान की पुष्टि करते हैं, अर्जुन की छाल में पाए जाने वाले टैनिन और फ्लैवोनॉयड प्राकृतिक रूप से सूजन को कम करते हैं. यह एक हर्बल माउथवॉश की तरह काम करता है, जो दांतों के एनेमल को सुरक्षित रखते हुए ब्लीडिंग रोकता है. विशेषज्ञों का मानना है कि ‘नमामि गंगे’ और ‘अमृत काल’ में जब हम आत्मनिर्भरता की बात कर रहे हैं, तो ऐसी स्वदेशी तकनीकें स्वास्थ्य और पॉकेट दोनों के लिए मुफीद हैं. KVK के खेतों से निकली यह छाल सिर्फ एक पेड़ का हिस्सा नहीं, बल्कि गाजीपुर की उस समृद्ध विरासत का हिस्सा है जहां आज भी प्रकृति ही सबसे बड़ी डॉक्टर है. हालांकि, गंभीर संक्रमण होने पर डॉक्टरी सलाह लेना भी अनिवार्य है.
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