Monte Carlo: 90% लोग नहीं जानते कहां की है ये कंपनी, कौन है मालिक, जिसने जाना वही चौंक गया!

Success story: आपने मोंटे कार्लो (Monte Carlo) का नाम तो सुना ही होगा. यह कपड़ों का एक बड़ा ब्रांड है. खासकर गर्म कपड़ों के लिए मशहूर है. लेकिन देश के लगभग 90 प्रतिशत लोगों को अभी तक यह मालूम नहीं है कि यह कंपनी किस देश की है. अगर आपको बताया जाए कि यह भारत की है और लुधियाना से इसका पूरा कारोबार चलता है तो शायद आप भी यकीन नहीं करेंगे. लेकिन यह पूरी तरह सच है. इस कंपनी की शुरुआत लुधियाना से हुई और धीरे-धीरे इसके पूरे भारत में गर्म कपड़ों के कारोबार पर लगभग एकछत्र राज स्थापित कर लिया. जब भी गर्म कपड़े खरीदने की बात होती है तो लोग मोंटे कार्लो के ऊनी कपड़ों पर आंख मूंदकर भरोसा करते हैं. इसका नाम ऐसा है, जैसे कि यह कोई यूरोपियन ब्रांड हो. इसके नामकरण की कहानी भी काफी दिलचस्प है.

कहानी की शुरुआत, शुरुआत से ही करते हैं. बात 1984 की है, जब पंजाब के हालात बहुत नाजुक थे. लुधियाना की सड़कों पर सन्नाटा पसरा रहता था और व्यापारी डरे हुए था. ऐसे माहौल में एक इंसान अपनी पुरानी साइकिल पर लुधियाना के ऊन बाजार में घूम रहा था. उनके पास न तो कोई बड़ा बैंक बैलेंस था और न ही कोई हाई-फाई डिग्री, लेकिन उनकी आंखों में एक सपना था कि भारत का अपना एक ऐसा ब्रांड हो, जो विदेशी कपड़ों को टक्कर दे सके. अमीर लोग अच्छे कपड़ों के लिए विदेशी ब्रांड्स की तरफ न देखें. उस वक्त भारत में लोग या तो टेलर से कपड़े सिलवाते थे या फिर महंगे विदेशी ब्रांड्स का सपना देखते थे. ओसवाल परिवार के जवाहर लाल ओसवाल ने इसी मुश्किल वक्त में एक ऐसी कंपनी की नींव रखी, जिसे आज हम मोंटे कार्लो के नाम से जानते हैं.

जवाहर लाल ओसवाल का जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ था, जो पहले से ही लुधियाना के टेक्सटाइल बिजनेस से जुड़ा था. ओसवाल ग्रुप (Oswal Group) का नाम पंजाब में बड़ा था, लेकिन जवाहर लाल कुछ अलग करना चाहते थे. उस जमाने में लुधियाना को ‘भारत का मैनचेस्टर’ कहा जाता था, क्योंकि वहां ऊन का काम बड़े पैमाने पर होता था. जवाहर ने बचपन से ही अपने पिता को धागों और मशीनों के बीच काम करते देखा था. उन्होंने देखा कि कैसे उनके परिवार का ओसवाल वूलन मिल्स लिमिटेड रूस और अन्य यूरोपीय देशों में स्वेटर एक्सपोर्ट करता था. लेकिन उनके मन में एक टीस थी. वह सोचते थे कि जो कपड़े हम विदेश भेज रहे हैं, वैसी ही अच्छी क्वालिटी वाला सामान हमारे अपने देश के लोगों को क्यों नहीं मिलता? भारतीय बाजार उस समय पूरी तरह से असंगठित था. लोग स्वेटर के नाम पर केवल हाथ से बुने हुए या किसी लोकल दुकान से खरीदे गए कपड़े पहनते थे, जिनका कोई खास स्टैंडर्ड नहीं होता था.

मोंटे कार्लो नाम ही क्यों रखा?

मोंटे कार्लो नाम के पीछे की कहानी उतनी ही दिलचस्प है जितना कि इस ब्रांड का सफर. 1980 के दशक में जब जवाहर लाल ओसवाल ने लुधियाना में इस कंपनी की नींव रखी, तो उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती थी एक ऐसा नाम ढूंढना जो प्रीमियम लगे और लोगों के जहन में बैठ जाए. उस वक्त भारत में स्वदेशी कपड़ों को अक्सर ‘लोकल’ और विदेशी कपड़ों को ‘क्वालिटी’ से जोड़कर देखा जाता था. जवाहर लाल जानते थे कि अगर उन्हें मार्केट में अपनी जगह बनानी है, तो उन्हें ग्लोबल अपील वाला नाम चाहिए होगा.

मोंटे कार्लो यूरोप के मोनाको देश का एक बहुत ही रईस और मशहूर इलाका है. यह जगह अपनी अमीरी, शानदार कैसिनो, और हाई-क्लास लाइफस्टाइल के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है. जवाहर लाल ओसवाल ने जब यह नाम चुना, तो उनका मकसद बहुत साफ था. वह चाहते थे कि जब कोई भारतीय ग्राहक इस नाम को सुने, तो उसके मन में यूरोपियन फैशन और लग्जरी की छवि बने. वह चाहते थे कि लुधियाना में बने उनके कपड़ों को भी वही इज्जत और दर्जा मिले जो पेरिस या इटली के कपड़ों को मिलता है.

शुरुआती दिनों में तो कई लोगों को यह गलतफहमी भी हुई कि यह कोई विदेशी ब्रांड है, जिसने भारत में अपना काम शुरू किया है. जवाहर लाल ने साइकोलॉजी का बखूबी इस्तेमाल किया. उन्होंने सिर्फ नाम ही विदेशी नहीं रखा, बल्कि कपड़ों की फिनिशिंग और पैकेजिंग भी उसी इंटरनेशनल स्टैंडर्ड की रखी. मोंटे कार्लो नाम रखने के पीछे एक और वजह यह थी कि यह नाम बोलने में आसान था और एक खास तरह की रॉयल्टी का अहसास कराता था.

शुरुआती दिनों में उन्हें काफी संघर्ष करना पड़ा. दुकानदारों को यह समझाना मुश्किल था कि लुधियाना में बना एक स्वेटर विदेशी ब्रांड्स जितना ही अच्छा हो सकता है. जवाहर खुद फैक्ट्रियों में घंटों बिताते थे. वे धागे की बनावट से लेकर बुनाई के पैटर्न तक हर चीज पर बारीकी से नजर रखते थे. उन्होंने इटली से नई मशीनें मंगवाईं, ताकि फिनिशिंग में कोई कमी न रहे. उस दौर में लुधियाना की कड़कड़ाती ठंड में जब बिजली कट जाती थी, तो वे लालटेन जलाकर मशीनों की मरम्मत करवाते थे, ताकि प्रोडक्शन न रुके.

ऑल-सीजन कपड़ों की मैन्युफैक्चरिंग

मोंटे कार्लो का असली टर्निंग पॉइंट तब आया, जब उन्होंने ऑल-सीजन कपड़े बनाने का फैसला किया. शुरुआत में यह केवल एक विंटर वियर ब्रांड था, यानी कंपनी साल में सिर्फ चार महीने ही बिजनेस करती थी. बाकी के आठ महीने सूखे रहते थे. जवाहर लाल ने तय किया कि वे सिर्फ स्वेटर नहीं बनाएंगे, बल्कि टी-शर्ट, शर्ट और ट्राउजर्स के बाजार में भी उतरेंगे. उन्होंने कॉटन और ब्लेंडेड फैब्रिक का इस्तेमाल शुरू किया. यह फैसला मोंटे कार्लो के लिए गेम चेंजर साबित हुआ. 2000 के दशक की शुरुआत में जब मॉल कल्चर भारत में पैर पसार रहा था, मोंटे कार्लो ने खुद को एक प्रीमियम लाइफस्टाइल ब्रांड के रूप में पेश किया. उन्होंने विज्ञापन की दुनिया में भी धमाका किया. उनके विज्ञापनों में एक खास तरह की क्लास और अमीरी झलकती थी, जिससे युवा वर्ग इसकी तरफ खिंचा चला आया.

जवाहर लाल ने देशभर में मोंटे कार्लो के एक्सक्लूसिव आउटलेट्स खोले और मल्टी-ब्रांड स्टोर्स के साथ पार्टनरशिप की. उन्होंने क्वालिटी से कभी समझौता नहीं किया. मोंटे कार्लो के स्वेटर की नरम ऊन और लंबे समय तक चलने वाली चमक उनकी पहचान बन गई.

Monte Carlo : कंपनी के फाइनेंशियल

मोंटे कार्लो भारतीय शेयर बाजार में एक लिस्टेड कंपनी है. 17 फरवरी 2026 तक इसका मार्केट कैप 1,209.61 करोड़ रुपये है. फिलहाल इसका शेयर 590 रुपये के आसपास ट्रेड हो रहा है. नवंबर 2025 में इसने 833 रुपये का हाई बनाया था. Monte Carlo Fashions Ltd. की पिछले 3 साल की सेल ग्रोथ, प्रॉफिट ग्रोथ की जानकारी दें. सेल की बात करें तो मार्च 2023 को खत्म हुए वित्त वर्ष में कंपनी ने 1,117.71 करोड़ रुपये की सेल की थी. 2024 में 1,061.91 करोड़ और 2025 में 1,100.41 रुपये रही.

नेट प्रॉफिट:

  • 2023 – 172.43 करोड़ रुपये
  • 2024 – 81.74 करोड़ रुपये
  • 2025 – 112.41 करोड़ रुपये

हालांकि, इस रास्ते में चुनौतियां कम नहीं हैं. चाइनीज कपड़ों की बाढ़ और बड़े इंटरनेशनल ब्रांड्स जैसे ज़ारा (Zara) और एचएंडएम (H&M) के भारत आने से बाजार में काफी कॉम्पिटिशन बढ़ गया. लेकिन मोंटे कार्लो ने अपनी जड़ों और भारतीय फिटिंग की समझ के कारण अपनी जगह बनाए रखी.

अब कौन संभाल रहा कंपनी

आज जवाहर लाल ओसवाल की उम्र 83 साल के करीब है, लेकिन उनका जोश आज भी वैसा ही है. अब उनके बेटे संदीप ओसवाल और पोते इस विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं. वे अब सिर्फ कपड़ों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि होम फर्निशिंग और एक्सेसरीज में भी उतर चुके हैं. लुधियाना के उस छोटे से दफ्तर से लेकर आज के आलीशान कॉरपोरेट ऑफिस तक, मोंटे कार्लो ने यह साबित कर दिया है कि अगर आपके इरादे पक्के हों, तो एक स्वेटर बेचने वाला भी दुनिया का फैशन लीडर बन सकता है. जब भी आप सर्दियों में किसी शोरूम के बाहर मोंटे कार्लो का बोर्ड देखते हैं, तो याद रखिएगा कि इसके पीछे एक पंजाबी परिवार की दशकों की मेहनत और लुधियाना की गलियों में देखा गया सपना है, जिसने भारतीय मिडल क्लास को पहली बार लग्जरी का अहसास कराया.

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