Broken Heart Syndrome: प्यार में मिला दर्द दिल-दिमाग दोनों को कर सकता है कमजोर! हल्‍के में न लें ‘ब्रोकन हार्ट सिंड्रोम’ को

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Broken Heart Syndrome: प्यार हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा होता है. जब रिश्ते टूटते हैं या कोई गहरा इमोशनल कनेक्‍शन टूटता है, तो हम अक्सर इसे सिर्फ दिल या दिमाग की तकलीफ समझते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि दिल टूटने का असर सिर्फ भावनाओं तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह आपके शरीर को भी बीमार कर सकता है? मेडिकल भाषा में इसे ब्रोकन हार्ट सिंड्रोम कहा जाता है.

क्या होता है ब्रोकन हार्ट सिंड्रोम(Broken Heart Syndrome)? जब कोई इंसान अचानक बहुत ज्यादा तनाव, दुख, डर या शॉक महसूस करता है, तो शरीर में स्ट्रेस हार्मोन तेजी से बढ़ जाते हैं. इसका असर सीधे दिल पर पड़ता है और कुछ समय के लिए दिल की मांसपेशियां कमजोर हो सकती हैं. कई बार इसके लक्षण हार्ट अटैक जैसे लगते हैं, इसलिए लोग घबरा जाते हैं. हालांकि, सही समय पर पहचान और इलाज से यह स्थिति कंट्रोल की जा सकती है.

शरीर पर क्या असर पड़ता है? ब्रोकन हार्ट सिंड्रोम के शारीरिक लक्षणों में तेज धड़कन, कमजोरी, थकान और नींद की समस्या शामिल हो सकती है. कई लोग इसे सामान्य थकावट या स्ट्रेस समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, जबकि यह शरीर की एक महत्वपूर्ण चेतावनी भी हो सकती है. इसलिए ऐसे संकेतों को हल्के में नहीं लेना चाहिए.

दिमाग और मानसिक स्वास्थ्य पर असर- इसका असर केवल शरीर पर ही नहीं, बल्कि दिमाग पर भी गहराई से पड़ता है. लगातार उदासी, चिंता, अकेलापन और नकारात्मक सोच मानसिक स्वास्थ्य को कमजोर कर सकते हैं. अगर यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहे, तो डिप्रेशन और एंग्जायटी जैसी समस्याएं भी बढ़ सकती हैं.

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विशेषज्ञों के अनुसार, जो लोग भावनात्मक रूप से ज्यादा संवेदनशील होते हैं या अचानक किसी बड़े दुख, नुकसान या तनाव का सामना करते हैं, उनमें ब्रोकन हार्ट सिंड्रोम का खतरा बढ़ जाता है. यह समस्या खासकर महिलाओं में ज्यादा देखी गई है, क्योंकि वे रिश्तों और भावनाओं को गहराई से महसूस करती हैं. ऐसे लोगों पर तनाव का असर जल्दी पड़ता है, जिससे दिल और मानसिक सेहत दोनों प्रभावित हो सकते हैं. इसलिए भावनात्मक तनाव को नजरअंदाज करना सही नहीं माना जाता.

अच्छी बात यह है कि सही देखभाल और समय पर ध्यान देने से इस स्थिति से बाहर निकला जा सकता है. शोधों में ये पाया गया है कि रोजाना हल्की एक्सरसाइज, वॉक, मेडिटेशन और संतुलित दिनचर्या का पालन करें तो ये दिमाग और दिल दोनों को मजबूत बनाए रखने में मदद करती हैं.

अगर आप महसूस कर रहे हैं कि आपको मदद चाहिए तो बेहतर होगा कि आप अपनी भावनाओं को दबाने के बजाय किसी भरोसेमंद व्यक्ति से बात करें. जरूरत पड़े तो काउंसलर या डॉक्टर की सलाह लेने में हिचकिचाएं नहीं, क्योंकि मानसिक और शारीरिक सेहत दोनों एक-दूसरे से जुड़ी होती हैं.

Journal of the American Heart Association के एक शोध के मुताबिक, 50 से 74 वर्ष की महिलाओं में ब्रोकन हार्ट सिंड्रोम होने का खतरा पुरुषों की तुलना में 6 से 10 गुना अधिक होता है. मेनोपॉज के बाद हार्मोनल बदलाव (विशेषकर एस्ट्रोजन की कमी) महिलाओं के दिल को तनाव के प्रति अधिक संवेदनशील बना देते हैं.

अगर आप या आपके आसपास कोई लंबे समय से मानसिक तनाव या ‘बर्नआउट’ महसूस कर रहा है, तो इसे नजरअंदाज न करें. विज्ञान कहता है कि “दिमाग जो महसूस करता है, दिल उसे भुगतता है. राहत की बात यह है कि हार्ट अटैक के विपरीत, ‘ब्रोकन हार्ट सिंड्रोम’ में दिल की धमनियां (Arteries) ब्लॉक नहीं होतीं और सही समय पर इलाज मिलने से दिल 1 से 4 हफ्तों में वापस सामान्य हो जाता है.

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