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Gwalior News: युवक को 24 जनवरी को एक कुत्ते ने काटा था. उसने इसे मामूली बात समझ एंटी रेबीज वैक्सीन नहीं लगवाई. कुछ दिनों बाद उसकी तबीयत बिगड़ने लगी. ग्वालियर के निजी अस्पताल में उसकी मौत हो गई.
ग्वालियर में रेबीज से यह चौथी मौत है.
रिपोर्ट- सुशील कौशिक, ग्वालियर. मध्य प्रदेश के ग्वालियर समेत कई जिलों में कटखने कुत्तों का आतंक बढ़ता ही जा रहा है. ग्वालियर में रेबीज से चौथी मौत हो गई है. छतरपुर निवासी एक युवक की रेबीज से मौत हुई है. वह ग्वालियर के निजी अस्पताल में भर्ती था. युवक छतरपुर के नौगांव का रहने वाला था. उसे गांव में 24 जनवरी को एक कुत्ते ने काटा था. कुत्ते के काटने के बाद युवक ने वैक्सीन नहीं लगवाई, जिससे उसे रेबीज हो गया. पहले उसे छतरपुर अस्पताल में भर्ती कराया गया. हालत बिगड़ने पर उसे छतरपुर से ग्वालियर रेफर किया गया, जहां इलाज के दौरान उसने दम तोड़ दिया. युवक की मौत से परिवार में कोहराम मच गया. परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है.
ग्वालियर में रेबीज से पहली मौत 4 फरवरी 2026 को हुई थी. गिरवाई थाना क्षेत्र के बगिया इलाके के रहने वाले 48 साल के किरण लालवानी को तीन जनवरी को एक कुत्ते ने काटा था. परिजनों का आरोप है कि स्थानीय क्लीनिक में डॉक्टर ने केवल टिटनेस का इंजेक्शन लगाया और एंटी-रेबीज वैक्सीन देने से मना कर दिया. करीब एक महीने बाद किरण में रेबीज के लक्षण दिखने लगे. पानी से डर लगना, मुंह से लार बहना और बेचैनी बढ़ गई. जिसके बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया लेकिन बचाया नहीं जा सका. इस मामले में डॉक्टर के खिलाफ लापरवाही का केस दर्ज किया गया है. वहीं रेबीज से टीकमगढ़ की 65 वर्षीय महिला की मौत भी हुई, जिसे सियार ने काटा था. समय पर एंटी-रेबीज वैक्सीन न मिलने के चलते संक्रमण तेजी से फैल गया. तबीयत बिगड़ने पर पीड़िता को ग्वालियर रेफर किया गया. इलाज के दौरान महिला की मौत हो गई.
लापरवाही और प्रशासनिक उदासीनता पर सवाल
रेबीज से हुई इन मौतों ने न केवल स्वास्थ्य व्यवस्था की तैयारियों पर सवाल उठाए हैं बल्कि आम लोगों की लापरवाही और प्रशासनिक उदासीनता को भी उजागर किया है. स्वास्थ्य विशेषज्ञ लगातार आगाह कर रहे हैं कि कुत्ते या किसी भी संदिग्ध जानवर के काटने के बाद एंटी-रेबीज वैक्सीन का पूरा कोर्स लेना बहुत जरूरी है. इसके बावजूद कई मामलों में इलाज अधूरा छोड़ दिया जा रहा है या इलाज समय पर शुरू ही नहीं किया जाता. ग्वालियर जैसे बड़े शहर में हर साल हजारों डॉग बाइट केस सामने आते हैं लेकिन स्ट्रीट डॉग कंट्रोल, बंध्याकरण और जन-जागरूकता की रफ्तार बेहद धीमी है. हालिया चार मौतों ने यह साफ कर दिया है कि अगर सिस्टम और समाज दोनों नहीं चेते, तो रेबीज और ज्यादा जानें ले सकता है.
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राहुल सिंह पिछले 10 साल से खबरों की दुनिया में सक्रिय हैं. टीवी से लेकर डिजिटल मीडिया तक के सफर में कई संस्थानों के साथ काम किया है. पिछले चार साल से नेटवर्क 18 समूह में जुड़े हुए हैं.
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