Benefits of Crying: मन भारी है तो जीभरकर रो लीजिए! मेंटल हेल्थ एक्सपर्ट्स इसे मानते हैं ‘बेस्ट थेरेपी’, जानें इसके फायदे

हम एक ऐसी दुनिया में रहते हैं जहाँ ‘मजबूत’ दिखने की होड़ मची है. बचपन से हमें सिखाया जाता है- “रोते नहीं हैं”, “बहादुर बनो” या “रोने से क्या होगा?”. लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिसे हम कमजोरी समझते हैं, विज्ञान की नजर में वह मानसिक सेहत का सबसे बड़ा ‘वरदान’ है? जी हां, अगर आपका मन भारी है, और आप कहीं एकांत जगह या बंद कमरे में जी भरकर रो लें तो यह आपके दिमाग को शांत करने और बेहतर महसूस करने का काम करता है.

मेडिकल न्‍यूज टुडे के मुताबिक, 2014 के एक अध्ययन के अनुसार, रोने का सीधा प्रभाव व्यक्ति को सुकून पहुँचाने पर पड़ता है, इस अध्ययन में बताया गया है कि रोने से हमारा पैरासिम्पेथेटिक नर्वस सिस्टम (PNS) सक्रिय हो जाता है, जो शरीर को आराम देने और तनाव मुक्त करने में मदद करता है.  मेंटल हेल्थ एक्सपर्ट्स इसे शरीर का ‘सेल्फ-क्लीनिंग मोड’ भी मानते हैं. तो आइए जानते हैं कि क्यों रोना आपके दिमाग और शरीर के लिए एक बेहतरीन थेरेपी है.
मेंटल हेल्थ एक्सपर्ट्स इसे शरीर का ‘सेल्फ-क्लीनिंग मोड’ भी मानते हैं.

1. यह शरीर का ‘नेचुरल डिटॉक्स’ है
जैसे हम पसीने के जरिए शरीर की गंदगी बाहर निकालते हैं, वैसे ही आंसू हमारे दिमाग से जहरीले रसायनों को बाहर निकालते हैं. जब हम तनाव में होते हैं, तो शरीर में कोर्टिसोल (Cortisol) जैसे स्ट्रेस हार्मोन बढ़ जाते हैं. रोते समय निकलने वाले आंसुओं के साथ ये हार्मोन भी बाहर निकल जाते हैं, जिससे मन तुरंत हल्का महसूस करने लगता है.

2. ‘फील गुड’ हार्मोन का रिलीज होना
क्या आपने कभी गौर किया है कि फूट-फूट कर रोने के बाद एक अजीब सी शांति महसूस होती है और नींद अच्छी आती है? ऐसा इसलिए होता है क्योंकि रोने से शरीर में ऑक्सीटोसिन (Oxytocin) और एंडोर्फिन (Endorphins) रिलीज होते हैं. ये ‘हैप्पी केमिकल्स’ न सिर्फ आपके शारीरिक दर्द को कम करते हैं, बल्कि आपके मूड को भी बेहतर बनाते हैं.

3. भावनाओं का ‘प्रेशर कुकर’ न बनें
भावनाएं एक प्रेशर कुकर की भाप की तरह होती हैं. अगर आप उन्हें अंदर दबाकर रखेंगे, तो एक दिन मानसिक विस्फोट (Mental Breakdown) होना तय है. एक्सपर्ट्स का मानना है कि जो लोग अपनी भावनाओं को दबाते हैं, उनमें डिप्रेशन, एंग्जायटी और यहां तक कि दिल की बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है. रोना उस ‘सेफ्टी वाल्व’ की तरह है जो दबाव को बाहर निकाल देता है.

4. नजरिया साफ होता है
जब मन भावनाओं के बोझ से दबा होता है, तो हमें सही-गलत का फैसला लेने में दिक्कत होती है. रोने के बाद जब मन का गुबार निकल जाता है, तो दिमाग शांत होता है. एक शांत दिमाग बेहतर तरीके से सोच सकता है और समस्याओं का समाधान ढूंढ सकता है.

रोने के बारे में समाज के ‘मिथक’ तोड़ें
रोना कमजोरी नहीं है: असल में, अपनी भावनाओं को स्वीकार करना और उन्हें व्यक्त करना सबसे बड़ी बहादुरी है.
लड़के भी रो सकते हैं: ‘मर्द को दर्द नहीं होता’ जैसे जुमले मानसिक स्वास्थ्य के दुश्मन हैं. भावनाएं जेंडर देखकर नहीं आतीं, इसलिए रोना सबके लिए सामान्य है.

कब जरूरी है रोना?
अगर आपको लग रहा है कि छोटी-छोटी बातों पर चिड़चिड़ाहट हो रही है, रात को नींद नहीं आ रही, या बिना वजह उदासी छाई है, तो समझ लीजिए कि आपके ‘इमोशनल टैंक’ को खाली करने की जरूरत है. दरअसल, रोना एक इलाज है, लेकिन अगर आप हफ्तों तक बिना रुके रो रहे हैं या आपको जीवन निरर्थक लग रहा है, तो यह डिप्रेशन का संकेत हो सकता है. ऐसी स्थिति में किसी प्रोफेशनल काउंसलर या थेरेपिस्ट से बात जरूर करें.

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