पटनाः समाज अक्सर महिलाओं के लिए लक्ष्मण रेखाएं खींचता है. जब बात सबसे पिछड़े पायदान पर खड़े मुसहर समुदाय की हो, तो चुनौतियां पहाड़ जैसी हो जाती हैं. लेकिन पटना की सड़कों पर जल्द ही एक नया इतिहास दौड़ता नजर आएगा. झुग्गी-झोपड़ियों से निकलकर छह युवतियां अब पिंक बस की ड्राइविंग सीट संभालने को तैयार हैं. यह कहानी केवल बस चलाने की नहीं, बल्कि उन रूढ़ियों को कुचलने की है जो कहती हैं कि बेटियां बस नहीं चला सकतीं.
तानों का सफर, बेटी भाग गई क्या?
इन छह जांबाज ड्राइवरों में से एक रागिनी हैं. पुनपुन की रहने वाली रागिनी के लिए ड्राइविंग सीट तक का सफर कांटों से भरा रहा है. रागिनी बताती हैं कि जब वह एक महीने की ट्रेनिंग के लिए घर से बाहर गईं, तो गांव में उनके चरित्र पर उंगलियां उठने लगीं. लोग उनके माता-पिता को ताने मारते थे. बेटी इतने दिन से घर नहीं आई, कहीं भाग तो नहीं गई? इसकी शादी कर दो वरना नाक कटवा देगी. इतना ही नहीं रागिनी की शारीरिक बनावट पर भी कटाक्ष किए गए. किसी ने कहा कि वह बहुत पतली हैं, तो किसी ने लंबाई का मजाक उड़ाया. लोगों का साफ कहना था ड्राइविंग लड़कों का काम है, एक्सीडेंट कर दोगी. लेकिन रागिनी ने इन तानों को ही अपना फ्यूल बना लिया.
रागिनी का परिवार बेहद अभावों में पला है. उनके दादा कचरा चुनकर घर चलाते थे, पिता टोला सेवक हैं. मां आज भी दूसरों के घरों में मजदूरी और खेतों में काम करती हैं. करीब तीन दर्जन सदस्यों वाले इस विशाल परिवार में रागिनी पहली ग्रेजुएट महिला हैं. उनकी शिक्षा का सफर सरकारी स्कूल से शुरू होकर नारी गुंजन संस्था के सहयोग तक पहुंचा. ग्रेजुएशन पूरा करने के बाद, महिला एवं बाल विकास निगम की मदद से उन्होंने औरंगाबाद में भारी वाहन चलाने का प्रशिक्षण लिया. आज उनके पास हेवी मोटर व्हीकल लाइसेंस है. रागिनी के साथ आरती, अनीता, सावित्री, गायत्री और बेबी भी इस मिशन में शामिल हैं, जो महादलित समुदाय से आती हैं.
जो हमने सहा, वो बेटी नहीं सहेगी
रागिनी की सफलता के पीछे उनकी मां का फौलादी इरादा है. उनकी मां कहती हैं कि हमने जिंदगी भर गोबर फेंका, दूसरों के खेतों में पसीना बहाया और कचरा उठाया. हमारे पास न जमीन है, न जायदाद. लेकिन हमने ठान लिया था कि जो अपमान हमने सहा, वो हमारी बेटी नहीं सहेगी. दुनिया कहती रही कि बेटी भाग जाएगी, लेकिन हमें अपनी बेटी पर भरोसा था. रागिनी का लक्ष्य अब बस चलाकर परिवार की आर्थिक स्थिति सुधारना है, ताकि उनकी मां को दूसरों के घरों में काम न करना पड़े.
हैरानी की बात यह है कि रागिनी का अंतिम लक्ष्य बस ड्राइवर बने रहना नहीं है. वह कहती हैं कि फिलहाल मैं पटना की सड़कों पर बस चलाकर उन लोगों की बोलती बंद करना चाहती हूं जो लड़कियों को कमजोर समझते हैं. जब परिवार आर्थिक रूप से संभल जाएगा, तब मैं पीएचडी (PhD) करूंगी और प्रोफेसर बनूंगी.
पिंक बस सेवा और महिला सशक्तिकरण
पटना में महिलाओं की सुरक्षा के लिए पिंक बस सेवा शुरू की गई थी, लेकिन महिला ड्राइवरों की कमी के कारण पुरुष ही इसे चला रहे थे. अब इन छह युवतियों की ट्रेनिंग पूरी हो चुकी है. इन्होंने गणतंत्र दिवस की झांकी में अपनी काबिलियत का ट्रेलर भी दिखा दिया है. हालांकि अभी भी इन्हें आम परिचालन के लिए स्टियरिंग सौंपने का इंतजार है.
.