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फर्जी निवास प्रमाणपत्र बनाकर गांधी मेडिकल कॉलेज में सीट लेने वाले डॉक्टर को भोपाल की अदालत ने दोषी ठहराया है. 15 साल तक चले केस के बाद अदालत ने चार धाराओं में तीन साल की सजा सुनाई. STF जांच में डोमिसाइल फर्जी साबित हुआ था.
शिवकांत आचार्य
भोपाल. फर्जी निवास प्रमाणपत्र के जरिए गांधी मेडिकल कॉलेज में दाखिला लेने वाले डॉक्टर को भोपाल की अदालत ने दोषी करार दिया है. अदालत ने आरोपी डॉक्टर को चार अलग-अलग धाराओं में तीन साल की सजा सुनाई है. यह फैसला करीब 15 साल तक चली लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद सामने आया है. मामले की सुनवाई भोपाल की सक्षम अदालत में चली, जहां अभियोजन पक्ष ने दस्तावेजी साक्ष्य और जांच एजेंसियों की रिपोर्ट के आधार पर यह साबित किया कि आरोपी डॉक्टर ने जानबूझकर फर्जी डोमिसाइल बनवाकर मध्यप्रदेश राज्य कोटे का लाभ लिया. अदालत ने यह भी माना कि इस फर्जीवाड़े से एक वास्तविक पात्र अभ्यर्थी का हक मारा गया.
2010 में सामने आया था डोमिसाइल फर्जीवाड़ा
यह पूरा मामला वर्ष 2010 में उजागर हुआ था. जांच में सामने आया कि आरोपी डॉक्टर सुनील सोनकर ने PMT परीक्षा पास करने के बाद खुद को मध्यप्रदेश का मूल निवासी बताया. इसी आधार पर उन्होंने राज्य कोटे के तहत गांधी मेडिकल कॉलेज में मेडिकल सीट हासिल की. बाद में शिकायत मिलने पर इस डोमिसाइल प्रमाणपत्र की जांच कराई गई, जिसमें कई विसंगतियां सामने आईं.
STF जांच में फर्जी निकला निवास प्रमाणपत्र
मामले की जांच विशेष कार्य बल STF को सौंपी गई थी. STF ने राजस्व रिकॉर्ड, स्थानीय प्रशासन के दस्तावेज और अन्य प्रमाणों की जांच के बाद यह निष्कर्ष निकाला कि प्रस्तुत किया गया निवास प्रमाणपत्र फर्जी था. इन सभी धाराओं में आरोपी को कुल मिलाकर तीन साल की सजा सुनाई गई है. जांच रिपोर्ट के आधार पर आरोपी के खिलाफ आपराधिक प्रकरण दर्ज किया गया और मामला अदालत तक पहुंचा.
भोपाल के अपर सत्र न्यायाधीश अतुल सक्सेना ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुनाया. अदालत ने माना कि आरोपी ने जानबूझकर गलत जानकारी देकर शासकीय व्यवस्था को गुमराह किया. अदालत द्वारा जिन धाराओं में दोषी ठहराया गया, वे इस प्रकार हैं:
- फर्जी दस्तावेज तैयार करना
- शासकीय रिकॉर्ड में गलत जानकारी देना
- धोखाधड़ी कर लाभ लेना
- कूटरचित दस्तावेज का उपयोग
केस की लंबी कानूनी यात्रा
इस मामले में फैसला आने में करीब 15 साल लग गए. जांच, आरोप तय होने, गवाहों की पेशी और कानूनी प्रक्रियाओं के चलते मामला लंबे समय तक अदालत में विचाराधीन रहा. इस दौरान आरोपी जमानत पर रहा और मेडिकल प्रैक्टिस भी करता रहा. आरोपी डॉक्टर सुनील सोनकर वर्तमान में मध्यप्रदेश के बीना क्षेत्र में रह रहा है. अभियोजन के अनुसार, डोमिसाइल फर्जी पाए जाने के बाद भी उसने लंबे समय तक कानूनी लड़ाई लड़ी. अदालत ने अपने फैसले में यह भी उल्लेख किया कि इस तरह के मामलों में देरी से न्याय मिलने पर भी दोष सिद्ध होने पर सजा जरूरी है.
मेडिकल शिक्षा व्यवस्था पर सवाल
इस फैसले ने मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश प्रक्रिया की निगरानी पर भी सवाल खड़े किए हैं. राज्य कोटे का लाभ उन्हीं छात्रों को मिलना चाहिए जो वास्तव में उस राज्य के निवासी हों. फर्जी दस्तावेजों के जरिए सीट लेना न केवल कानूनन अपराध है, बल्कि यह सामाजिक अन्याय भी है.
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सुमित वर्मा, News18 में 4 सालों से एसोसिएट एडीटर पद पर कार्यरत हैं. बीते 3 दशकों से सक्रिय पत्रकारिता में अपनी अलग पहचान रखते हैं. देश के नामचीन मीडिया संस्थानों में सजग जिम्मेदार पदों पर काम करने का अनुभव. प…और पढ़ें
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