Success Story: खंडवा में शायद ही कोई ऐसा युवा हो, जो सरकारी नौकरी का सपना न देखता हो. कोई पुलिस बनना चाहता है, तो कोई पटवारी या शिक्षक. सालों की पढ़ाई, दौड़-भाग और मेहनत के बाद भी जब रिजल्ट हाथ नहीं लगता, तो कई युवा टूट जाते हैं. लेकिन इसी भीड़ से निकलकर खंडवा के पीयूष यादव ने कुछ अलग करने का फैसला किया और आज वे खुद की पहचान बना चुके हैं.
पढ़ाई पूरी की, पुलिस बनने की तैयारी शुरू की
पीयूष यादव ने खंडवा के एसएन कॉलेज से बीकॉम की पढ़ाई की. पढ़ाई खत्म होते ही उन्होंने पुलिस भर्ती की तैयारी शुरू कर दी. साल 2017 से लगातार मेहनत की सुबह दौड़, दिन में पढ़ाई और हर संभव कोशिश. लेकिन किस्मत ने साथ नहीं दिया. इसी दौरान परिवार की आर्थिक हालत भी कमजोर होने लगी. घर की जिम्मेदारियां बढ़ीं और एक समय ऐसा आया जब उन्हें अपना सपना बीच में ही छोड़ना पड़ा.
हार मानना नहीं था विकल्प
पीयूष बताते हैं कि उस दौर में दो ही रास्ते थे या तो हालात से हार मान ली जाए, या फिर कुछ नया शुरू किया जाए. उन्होंने हार मानने के बजाय हिम्मत को अपनी ताकत बनाया. बिना किसी बड़े निवेश के उन्होंने एक छोटा सा ठेला लगाया और अंडे के आइटम बनाना शुरू किया. शुरुआत में ग्राहक कम थे, लेकिन पीयूष ने कभी काम को छोटा नहीं समझा.
“यादव अंडा सेंटर” बना खंडवा की पहचान
धीरे-धीरे मेहनत रंग लाई और आज पीयूष की दुकान “यादव अंडा सेंटर” खंडवा के जिला अस्पताल के सामने चल रही है. शाम 5 बजे से रात 11 बजे तक यहां लोगों की भीड़ लगी रहती है, खासकर युवा वर्ग बड़ी संख्या में पहुंचता है. चीज भुर्जी, नॉर्मल भुर्जी, चीज बटर आइटम, चीज सैंडविच और ब्रेड आइटम यहां के सबसे पसंदीदा आइटम बन चुके हैं.
5-6 घंटे में 3000 रुपये तक की कमाई
पीयूष बताते हैं कि आज वे सिर्फ 5 से 6 घंटे काम करके रोजाना 2500 से 3000 रुपये तक कमा लेते हैं. इतना ही नहीं, उनकी दुकान से चार लोगों को रोजगार भी मिला है, जिससे चार परिवारों की रोजी-रोटी चल रही है.
परिवार बना सबसे बड़ी ताकत
पीयूष के इस सफर में परिवार का पूरा साथ मिला. भाई तेजस यादव एक फाइनेंस कंपनी में काम करते हैं, पिता की खुद की दूध डेयरी है और माता-पिता व पत्नी हर फैसले में उनके साथ खड़े रहे.
युवाओं के लिए बड़ी सीख
पीयूष यादव की कहानी उन युवाओं के लिए मिसाल है, जो सरकारी नौकरी न मिलने पर खुद को असफल मान लेते हैं. यह कहानी बताती है कि काम कोई छोटा नहीं होता, सोच बड़ी होनी चाहिए. अगर जज़्बा, मेहनत और ईमानदारी हो, तो छोटा सा ठेला भी बड़ी पहचान बना सकता है.
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