लैपटॉप बना था ‘फ्लॉप ऐप्‍स’ का कब्रिस्तान, फिर एक आइडिया ने बदल दी किस्‍मत

नई दिल्‍ली. स्टार्टअप की चकाचौंध भरी दुनिया में लोगों को अक्सर सफलता के ऊंचे शिखर तो दिखते हैं, लेकिन ऊंचाइयों पर पहुंचने के लिए तय किए गए कांटों भरे रास्‍तों के बारे में पता नहीं होता. सफलता आसानी से नहीं मिलती. कुछ के लिए तो यह भूसे के ढेर में सुई ढूंढने के समान हो जाती है. ऐसा ही हुआ शेयरचैट संस्‍थापक अंकुश सचदेवा के साथ. सचदेवा की कहानी किसी बॉलीवुड फिल्म जैसी रोमांचक है जहां हीरो एक या दो बार नहीं, बल्कि पूरे 17 बार हारता है, लेकिन 18वें प्रयास में वह इतिहास रच देता है. आज शेयरचैट ₹40,000 करोड़ की वैल्यूएशन वाली कंपनी है. ऐसे में इस कंपनी को बनाने में सचदेवा के संघर्ष को जानना बेहद जरूरी है.

अंकुश सचदेवा IIT कानपुर से पढे हैं. साल 2012-13 का वह समय था जब कैंपस में प्लेसमेंट की धूम थी. उनके साथ के छात्र गूगल, फेसबुक और माइक्रोसॉफ्ट जैसी दिग्गज कंपनियों में करोड़ों के पैकेज पा रहे थे. लेकिन अंकुश का मन नौकरी करने का बिल्‍कुल भी न था. वे अपनी खुद की दुनिया बसाना चाहते थे. लेकिन शुरुआत आसान नहीं थी. शेयरचैट से पहले अंकुश ने एक के बाद एक 17 अलग-अलग आइडियाज पर काम किया और वे सभी बुरी तरह फ्लॉप रहे.

बार-बार असफलता से भी न डिगा हौसला

अंकुश सचदेवा ने एजुकेशन प्लेटफॉर्म और लोकल सर्विस ऐप सहित कई तरह के स्‍टार्टअप खड़ा करने की कोशिश की. लेकिन बाजार ने उनके हर प्रयास को नकार दिया. उनके लैपटॉप का हार्ड डिस्क उन कोड्स का कब्रिस्तान बन चुका था जो कभी ऐप बनकर दुनिया के सामने नहीं आ सके. दोस्त मजाक में पूछते थे, “भाई, इस बार कौन सा नया फेलियर प्लान है?” लेकिन अंकुश हार मानने वालों में से नहीं थे. वे हर असफलता को एक ‘डेटा पॉइंट’ मानते थे.

17 ‘शून्य’ और एक ‘यूरिका मोमेंट’

अंकुश ने अपनी 17 असफलताओं से एक सबक सीखा था कि वे अब तक उन लोगों के लिए उत्पाद बना रहे थे जो पहले से ही इंटरनेट का इस्‍तेमाल कर रहे थे और अंग्रेजी जानते थे. लेकिन असली भारत, यानी ‘भारत’ (Bharat), जो छोटे शहरों और गांवों में बसता है, उसके पास अपनी भाषा में कोई डिजिटल ‘नुक्कड़’ नहीं था. साल 2015 में अंकुश ने अपने दोस्तों फरीद अहसन और भानु सिंह के साथ मिलकर एक ऐसी समस्या को पहचाना जिसे सिलिकॉन वैली के दिग्गजों ने भी नजरअंदाज कर दिया था. वह समस्या थी भाषा का अवरोध. भारत में करोड़ों लोग इंटरनेट पर आ रहे थे, लेकिन वहां की भाषा और कंटेंट विदेशी था.

शेयरचैट का जन्‍म

इसी गैप को भरने के लिए उन्‍होंने ShareChat की स्‍थापना की. अंकुश ने तय किया कि शेयरचैट किसी विदेशी ऐप का हिंदी अनुवाद नहीं होगा, बल्कि इसे जमीन से ही भारतीय भाषाओं के लिए तैयार किया जाएगा. उन्होंने इसे सबसे पहले हिंदी में लॉन्च किया और फिर धीरे-धीरे मलयालम, गुजराती, बंगाली और पंजाबी जैसी 15 भारतीय भाषाओं तक ले गए.
यह प्लेटफॉर्म उन लोगों की आवाज बन गया जो अब तक फेसबुक या ट्विटर पर अपनी बात कहने में संकोच करते थे. यहां एक किसान अपनी फसल की जानकारी शेयर कर रहा था, तो एक गृहिणी अपनी नई रेसिपी. नतीजा यह हुआ कि शेयरचैट किसी वायरल आग की तरह फैल गया. 2022 तक इसके एक्टिव यूजर्स की संख्या 16 करोड़ को पार कर गई और कंपनी का वैल्यूएशन लगभग ₹40,000 करोड़ ($5 Billion) के जादुई आंकड़े को छू गया.

धैर्य और विजन बने सफलता के स्‍तम्‍भ

अंकुश सचदेवा की सफलता की कहानी केवल पैसों या यूनिकॉर्न स्टेटस के बारे में नहीं है. यह कहानी है उस अथक धैर्य (Grit) की, जिसने 17 बार ‘ना’ सुनने के बाद भी 18वीं बार खड़े होने की हिम्मत दिखाई. आज अंकुश सचदेवा उन लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा हैं जो एक या दो असफलता के बाद टूट जाते हैं. उनकी यात्रा सिखाती है कि यदि आपका विजन सही है और आप अपनी गलतियों से सीखने को तैयार हैं, तो आपकी असफलताएं एक ‘बड़े ध्माके’ नींव बन सकती है.

.

Share me..

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *