Red Bull Story: बैंकॉक में एक लंबा-चौड़ा जवान शख्स तपती धूप में एक छोटी-सी दुकान के बाहर खड़ा था. उसके सिर में दर्द हो रहा था, शरीर थककर चूर हो चुका था. उसे एक मीटिंग में जाना था, लेकिन सिरदर्द और थकान उसे आगे बढ़ने से रोक रही थे. वह हजारों मील दूर ऑस्ट्रिया से थाईलैंड आया था. अपनी थकान मिटाने के लिए वह दुकान से एक छोटी-सी भूरे रंग की कांच की बोतल खरीदता है, जिस पर 2 लाल बैल छपे हुए थे. वह एक ही सांस में उसे गटक गया. कुछ ही मिनटों में उसका सिरदर्द गायब हो गया. उसे महसूस हुआ, जैसे उसके शरीर में बिजली दौड़ गई हो. उसे यकीन नहीं आ रहा था, लेकिन यह उसी के साथ हुआ था तो यकीन करना पड़ा. उस दिन उस आदमी ने सिर्फ एक ड्रिंक नहीं पी थी, बल्कि उसने एक ऐसा आइडिया मिल गया था, जो आने वाले समय में पूरी दुनिया पर छाने वाला था. उस आदमी का नाम था डिट्रिच माटेस्चिट्ज (Dietrich Mateschitz) और उस ड्रिंक का नाम था क्रेटिंग डेंग (Krating Daeng). उसी ड्रिंक को आज हम और आप रेड बुल (Reb Bull) के नाम से जानते हैं.
रेड बुल की यह कहानी के दो हीरो हैं. एक तो डिट्रिच माटेस्चिट्ज और दूसरा थाईलैंड के चेलियो योविध्या (Chaleo Yoovidhya). चेलियो का जन्म एक गरीब परिवार में हुआ था. उनके माता-पिता बत्तख पालते थे और फल बेचते थे. बचपन से ही चेलियो ने गरीबी को बहुत करीब से देखा था. उनके पास पढ़ने के लिए बहुत ज्यादा पैसे नहीं थे, इसलिए उन्होंने छोटी उम्र में ही काम करना शुरू कर दिया. वह बस में टिकट काटने का काम करते थे और बाद में दवाइयां बेचने लगे. धीरे-धीरे मेहनत करके उन्होंने अपनी एक छोटी-सी दवा की कंपनी खोली, जिसका नाम ‘टीसी फार्मास्यूटिकल’ रखा.
मजदूरों, ट्रक ड्राइवरों के लिए बनी थी ड्रिंक
70 के दशक में थाईलैंड में मजदूर, ट्रक ड्राइवर और किसान दिन-रात मेहनत करते थे. चेलियो ने देखा कि ये लोग काम के दौरान बहुत थक जाते हैं और उन्हें अपनी थकान मिटाने के लिए कुछ सस्ता और असरदार चाहिए. उस समय बाजार में कुछ जापानी ड्रिंक्स आती थीं, लेकिन वे बहुत महंगी थीं और सिर्फ अमीर लोग ही उन्हें पी पाते थे. चेलियो ने सोचा कि क्यों न एक ऐसी ड्रिंक बनाई जाए, जो आम आदमी की पहुंच में हो और उसे काम करने की ताकत दे. उन्होंने अपनी लैब में प्रयोग शुरू किए और चीनी, कैफीन और टॉरीन जैसी चीजों को मिलाकर एक सिरप तैयार किया. इसका नाम रखा गया ‘क्रेटिंग डेंग’, जिसका मतलब था ‘लाल जंगली सांड’. यह ड्रिंक थाईलैंड के गांव-गांव में मशहूर हो गया. ट्रक ड्राइवर इसे पीकर रात-रात भर गाड़ी चलाते थे और मजदूर घंटों बिना थके काम करते थे. लेकिन इसे विश्व स्तर तक पहुंचाने का काम किया कहानी के दूसरे महत्वपूर्ण किरदार ने.
चेलियो योविध्या (Chaleo Yoovidhya).
ऑस्ट्रिया में डिट्रिच माटेस्चिट्ज एक बड़ी कंपनी में मार्केटिंग का काम करते थे. वह टूथपेस्ट और साबुन बेचने के लिए पूरी दुनिया में घूमते रहते थे. उनकी जिन्दगी ऐशो-आराम वाली थी, लेकिन उनके मन में हमेशा कुछ अपना करने की तड़प थी. 1982 में थाईलैंड में जब उन्होंने लाल सांड वाली ड्रिंक पी, तो उनके लिए सबकुछ बदल गया. डिट्रिच एक मार्केटिंग एक्सपर्ट थे, उन्होंने तुरंत भांप लिया कि यूरोप और अमेरिका में ऐसी कोई ड्रिंक मौजूद ही नहीं है. वहां लोग या तो कॉफी पीते थे या फिर सोडा. उन्हें लगा कि अगर वह इस ड्रिंक को सही तरीके से दुनिया के सामने पेश करें, तो एक बहुत बड़ा बिजनेस बन सकता है.
डिट्रिच माटेस्चिट्ज (Dietrich Mateschitz).
Red Bull: डिट्रिच और चेलियो की पार्टनरशिप
यही सोचकर डिट्रिच ने चेलियो से मुलाकात की. उनके सामने पार्टनरशिप का प्रस्ताव रखा. बात बनी तो दोनों ने 5-5 लाख डॉलर लगाएं और एक नई कंपनी बनाई. चेलियो को 49 परसेंट हिस्सा मिला, डिट्रिच को 49 परसेंट और बाकी का 2 प्रतिशत हिस्सा चेलियो के बेटे को दिया गया. कुल मिलाकर चेलियो के पास फैसले लेने की पावर थी. शर्त यह थी कि कंपनी को चलाने का पूरा जिम्मा डिट्रिच संभालेंगे.
डिट्रिच ने अपनी जमी-जमाई नौकरी छोड़ दी और अपनी सारी जमा-पूंजी इस नए काम में लगाकर भाग-दौड़ शुरू कर दी. उनके दोस्तों और परिवार वालों ने उन्हें समझाया कि यह एक पागलपन है. लोग कह रहे थे कि कोई भी इंसान उस सिरप जैसी दिखने वाली ड्रिंक को नहीं खरीदेगा, जिसका स्वाद थोड़ा अजीब है. लेकिन डिट्रिच तो जमे हुए सीमेंट सा इरादा बना चुके थे.
लाइसेंस पाने के लिए दर-दर भटके
अगले तीन साल डिट्रिच के लिए किसी बुरे सपने से कम नहीं थे. उन्हें ऑस्ट्रिया की सरकार से इस ड्रिंक को बेचने का लाइसेंस लेने के लिए दर-दर भटकना पड़ा. सरकारी अफसरों को लगता था कि इसमें बहुत ज्यादा कैफीन है और यह सेहत के लिए खतरनाक हो सकती है. साथ ही, जब उन्होंने मार्केट रिसर्च करवाई, तो नतीजा बहुत ही खराब निकला. लोगों ने कहा कि इसका स्वाद बहुत बुरा है और वे इसे कभी नहीं खरीदेंगे. किसी भी दूसरे इंसान ने हार मान ली होती, लेकिन डिट्रिच ने एक बहुत बड़ी बात कही थी. उन्होंने कहा था, “अगर बाजार नहीं है, तो हम बाजार बनाएंगे.” उन्होंने ड्रिंक के स्वाद में थोड़ा बदलाव किया, उसमें सोडा जैसी गैस मिलाई और उसे कांच की बोतल से हटाकर एक पतले नीले और चांदी के रंग वाले कैन में डाल दिया. 1987 में पहली बार ऑस्ट्रिया के बाजारों में रेड बुल के नाम से यह ड्रिंक उतरी.
कूड़ादानों में डलवा दिए रेड बुल के केन
शुरुआत में बिक्री बहुत कम थी. रेड बुल की कीमत उस समय के कोका-कोला या पेप्सी से लगभग दोगुनी रखी गई थी. डिट्रिच ने यह जानबूझकर किया था, ताकि लोगों को लगे कि यह कोई आम कोल्ड ड्रिंक नहीं है, बल्कि एक प्रीमियम एनर्जी ड्रिंक है. उन्होंने विज्ञापन के पुराने तरीकों को पूरी तरह से नकार दिया. उन्होंने टीवी पर महंगे विज्ञापन देने के बजाय एक अलग और अनोखा रास्ता चुना. वह यूनिवर्सिटी के छात्रों के पास गए और उन्हें अपनी कारों पर बड़े-बड़े रेड बुल के कैन लगाकर घूमने के लिए कहा. वे कॉलेजों की पार्टियों में मुफ्त में रेड बुल बांटने लगे. डिट्रिच ने एक और मजेदार काम किया कि उन्होंने कूड़ादानों में रेड बुल के खाली कैन डलवा दिए, ताकि लोगों को लगे कि हर कोई इसे पी रहा है. धीरे-धीरे लोगों में इसे लेकर एक जिज्ञासा पैदा होने लगी. लोग पूछने लगे कि यह नीले कैन वाली चीज क्या है, जो इतनी महंगी बिकती है और इसे पीने से क्या सच में पंख लग जाते हैं?
जोखिम से बना दिया कनेक्शन
रेड बुल की मार्केटिंग का सबसे बड़ा हिस्सा था ‘जोखिम’. डिट्रिच ने देखा कि युवा लोग एड्रेनालिन और रोमांच पसंद करते हैं. इसलिए उन्होंने ऐसे खेलों को स्पॉन्सर करना शुरू किया, जिनके बारे में कोई सोचता भी नहीं था. उन्होंने पहाड़ों से छलांग लगाने वाले, हवा में करतब दिखाने वाले और तेज कार चलाने वाले खिलाड़ियों को चुना. धीरे-धीरे रेड बुल सिर्फ एक ड्रिंक नहीं, बल्कि एक लाइफस्टाइल बन गई. जब कोई रेड बुल पीता था, तो उसे लगता था कि वह कुछ हटकर कर रहा है. कंपनी का नारा “रेड बुल गिव्स यू विंग्स” यानी “रेड बुल आपको पंख देता है” घर-घर में मशहूर हो गया. हालांकि इसके पीछे कोई वैज्ञानिक आधार नहीं था, जैसा कि अक्सर विज्ञापनों में नहीं होगा. लेकिन यह बात लोगों के दिल में बैठ गई.
Red Bull: पूरा ध्यान मार्केटिंग पर
बिजनेस मॉडल की बात करें तो रेड बुल की रणनीति साफ थी. वे खुद ड्रिंक नहीं बनाते थे, बल्कि उन्होंने इसका ठेका दूसरी कंपनियों को दे रखा था. रेड बुल का पूरा ध्यान सिर्फ मार्केटिंग और ब्रांड बनाने पर था. वे दुनियाभर में बड़े-बड़े इवेंट्स करवाते थे और खुद की मीडिया कंपनी भी खोल ली. आज रेड बुल के पास अपनी खुद की फॉर्मूला वन रेसिंग टीम है, फुटबॉल क्लब हैं और वे अंतरिक्ष से छलांग लगाने जैसे बड़े कारनामों को स्पॉन्सर करते हैं. जब फेलिक्स बॉमगार्टनर ने अंतरिक्ष से धरती पर छलांग लगाई थी, तो उस समय पूरी दुनिया की नजरें उनके सूट पर बने रेड बुल के लोगो पर थीं. यह मार्केटिंग का एक ऐसा मास्टरस्ट्रोक था, जिसकी कोई कीमत नहीं लगाई जा सकती.
हर साल 12 अरब से ज्यादा केन की सेल
आज रेड बुल दुनिया की सबसे बड़ी एनर्जी ड्रिंक कंपनी है. हर साल इसके 12 अरब से भी ज्यादा केन बेचे जाते हैं. जिस चेलियो योविध्या ने गरीबी में अपना बचपन बिताया था, वह मरने से पहले थाईलैंड के सबसे अमीर इंसानों में से एक बन गए थे. वहीं डिट्रिच माटेस्चिट्ज, जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी की कमाई दांव पर लगा दी थी, वह दुनिया के सबसे सफल बिजनेसमैन में गिने जाने लगे. हालांकि डिट्रिच भी अब हमारे बीच नहीं रहे, लेकिन उन्होंने जो साम्राज्य खड़ा किया है, वह आज भी फल-फूल रहा है. 175 से ज्यादा देशों में रेड बुल का राज है और हजारों लोग इसमें काम करते हैं.
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