घर, नौकरी और थिएटर तीनों को साधती अनामिका सिंह बघेल बनीं विंध्य की प्रेरणा, अब तक मिल चुके है कई सम्मान 

शिवांक द्विविद
सतना:
अभी काम करने को बोल दो तो थक जाएगी और नाटक करने को कहो तो तुरंत तैयार- समाज और रिश्तेदार के ये ताने हमेशा सुनने वाली सतना की अनामिका सिंह बघेल आज यह साबित कर रही हैं कि अगर जुनून जिंदा हो तो उम्र कभी बाधा नहीं बनती. रंगमंच को सिर्फ शौक नहीं बल्कि जीवन का उद्देश्य मानने वाली अनामिका आज विंध्य क्षेत्र में थिएटर को नई पहचान दिला रही हैं. मंच, अभिनय, निर्देशन और प्रशिक्षण के जरिए उन्होंने न केवल अपनी पहचान बनाई बल्कि सैकड़ों युवाओं के लिए प्रेरणा भी बनीं.

बचपन से कला से जुड़ाव, मंच से बना रिश्ता 
अनामिका का रंगमंच से रिश्ता बचपन में ही बन गया था. पहली कक्षा से ही वे नृत्य नाटिकाओं और स्टेज शोज़ में भाग लेने लगी थीं. स्कूल और कॉलेज जीवन में थिएटर और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों में उनकी सक्रिय भागीदारी ने उनके भीतर छिपे कलाकार को लगातार मजबूत किया. मंच पर अभिनय करते हुए उन्हें जो आत्मसंतोष मिलता था वही आगे चलकर उनके जीवन की दिशा तय करने वाला साबित हुआ.

पढ़ाई, जिम्मेदारियां और जुनून का संतुलन
अनामिका ने संगीत में एमए, हिंदी साहित्य में एमए और बीएड की पढ़ाई पूरी की है जबकि वर्तमान में वे पीएचडी की तैयारी कर रही हैं. इसके साथ ही वे श्री रामा ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूट में पीआरओ के रूप में कार्यरत हैं और सिविल लाइन स्थित ब्रांच की हेड भी हैं. वहीं इतने दायित्वों के बावजूद वे खुद को आज भी दिल से एक रंगकर्मी मानती हैं. उनका मानना है कि कला को पहचान दिलाने के लिए सही राह और सकारात्मक माहौल दोनों जरूरी हैं.

जिम्‍मेदारियां बढ़ी तो लिया था ब्रेक, फिर 
कॉलेज के बाद शादी और फिर मातृत्व की जिम्मेदारियों के कारण लगभग 5–6 वर्षों तक उनका रंगमंचीय सफर थम गया. घर-परिवार और बच्चे की जिम्मेदारियों के बीच अपने जुनून को समय देना आसान नहीं था. लेकिन किस्मत ने फिर एक मौका दिया जब उन्होंने विट्स कॉलेज जॉइन किया. वहीं उन्हें एक नाटक मंडली मिली जिसने उनके भीतर सोए कलाकार को दोबारा जगा दिया.

थिएटर की बारीकियां और राष्ट्रीय पहचान 
इसी कॉलेज में ही अनामिका ने रंगकर्मी शुभम बारी के साथ काम किया जो मध्य प्रदेश स्कूल ऑफ ड्रामा से पास आउट है. यहीं उन्होंने ब्लॉकिंग, बैकस्टेज मैनेजमेंट, प्रॉप्स और नाटक आदि की तकनीकी बारीकियां सीखीं. अब तक उनका सबसे चर्चित प्रदर्शन विश्व का पहला लिखित नाटक आनंद रघुनंद रहा है जिसका वे देश के कई राज्यों में लगभग 20 बार मंचन कर चुकी हैं. वहीं इस नाटक को अब दिल्ली के प्रतिष्ठित एनएसडी रंगमंडल में प्रस्तुत किया जाना है.

सम्मान, जिम्मेदारियां और समाज को संदेश
अनामिका सिंह बघेल को उनके योगदान के लिए कई मंचों पर सम्मान मिल चुका है और अब उन्हें प्रतिष्ठित विंध्य गौरव अवार्ड से सम्मानित किया जाना है. वे संस्कार भारती में महाकौशल प्रांत की नाट्य प्रमुख रह चुकी हैं और वर्तमान में लोकमाता अहिल्याबाई ग्रुप में प्रांतीय प्रतिनिधित्व कर रही हैं. साथ ही वर्तमान में मैहर मातृ शक्ति टोली की जिला प्रभारी भी हैं.

कभी भी अपने पैशन को मत छोड़िए
अनामिका बुजुर्ग और युवा रंगकर्मियों को संदेश देती हैं कि कभी भी अपने पैशन को मत छोड़िए. कोई लिखता है, कोई गाता है, कोई अभिनय करता है हर प्रतिभा को पहचान और मंच मिलना चाहिए.आज के डिजिटल युग में सोशल मीडिया भी कला को आगे बढ़ाने का सशक्त माध्यम बन सकता है. उनके जीवन की कहानी यही सिखाती है कि अगर हौसले मजबूत हों तो उम्र सिर्फ एक संख्या बनकर रह जाती है.

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