16 Years old Girl Paralyses: मैं 16 साल की लड़की हूं. मेरा नाम अंशु है. मैं इस हाल में हूं कि आपको बता नहीं सकता. मेरी कंडीशन ठीक नहीं है. मुझे पैरालिसिस है. मैं साल भर से इलाज करा रही हूं. डॉक्टर से दिखा रही हूं. दवा भी खा रही हूं लेकिन इसके बावजूद मेरा बायां अंग सही से काम नहीं कर रहा है. हमारी एक यूजर ने हमसे यह सवाल किया है. हमने इस सवाल का जवाब जानने के लिए आकाश हेल्थकेयर नई दिल्ली में न्यूरोलॉजी डिपार्टमेंट के डायरेक्टर डॉ. मधुलकर भारद्वाज से बात की है. दरअसल, इस जवाब को जानना इसलिए भी जरूरी है कि जानकारी के अभाव में अधिकांश लोग लकवाग्रस्त होने के बाद सही नहीं होते. इससे जीवन की गुणवत्ता खराब होने लगती है. इसलिए हम सबको डॉ. मधुलकर भारद्वाज की बातों को जानना बहुत जरूरी है.
पैरालिलिस होती क्यों है
पहले यह जानते हैं कि पैरालिसिस की बीमारी होती क्यों है. डॉ. मधुलकर भारद्वाज ने बताया कि इसे मेडिकल भाषा में स्ट्रोक कहा जाता है. स्ट्रोक तब होता है जब दिमाग में किसी कारणवश खून नहीं पहुंचता. इसके कई कारण होते हैं. समझना यह है कि जिस तरह कोई पौधा होता है और उसकी जड़ें होती हैं, उसी तरह से हमारे शरीर का दिमाग पौधे की जड़ों की तरह है जहां से असंख्य तार (नर्व) निकलकर शरीर के रोम-रोम तक पहुंचता है. पैरालिसिस की बीमारी तब होती है जब दिमाग को खून के साथ ऑक्सीजन पहुंचाने वाली कैरोटीड आर्टरीज में खून का थक्का जमा जाता है. इसे ब्लड क्लॉट कहते हैं. थक्का जमने के कारण खून आगे दिमाग तक नहीं बढ़ता है.जब दिमाग तक खून नहीं पहुंचेगा तो वहां ऑक्सीजन भी नहीं पहुंचेगी और जिस हिस्से में ऑक्सीजन नहीं पहुंचेगी वह हिस्सा डैमेज हो जाएगा. यानी उस हिस्से से जिन-जिन अंगों का नियंत्रण होता है अब वह नहीं होगा. चूंकि हमारे दिमाग का बायां हिस्सा शरीर को दाएं भाग को कंट्रोल करता है और दायां हिस्सा शरीर के बाएं भाग को कंट्रोल करता है. इसलिए जब दिमाग के दाएं भाग में डैमेज होगा तो शरीर के बाएं अंगों में संचालन कम हो जाएगा या पूरी तरह बंद हो जाएगा.
शरीर के कितने अंग काम नहीं करेंगे
डॉ. मधुलकर भारद्वाज ने कहा कि यह इस बात पर निर्भर करता है कि ब्रेन का कितना हिस्सा डैमेज हुआ है और कितनी देर तक इलाज नहीं हुआ है. अगर कैरोटिड आर्टरीज पूरी तरह से क्लॉट हो गया है और समय पर इलाज नहीं हुआ तो इस बात की आशंका ज्यादा है कि शरीर का एक हिस्सा पूरी तरह से पैरालाइज हो जाएगा. अगर आंशिक रूप से डैमेज है तो यह कुछ हिस्से में हरकतों को प्रभावित करेगा. लेकिन इन चीजों की सही तरीके से जांच के लिए सीटी स्कैन या एमआरआई की जरूरत होती है और वह कोई स्पेशलाइज्ड न्यूरोलॉजिस्ट ही बात सकता है.
किसे हो सकता है पैरालिसिस
पैरिलिसिस आज पैदा लेने वाले बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक किसी को भी हो सकता है. हालांकि 40 साल से कम उम्र के लोगों में पैरालिसिस की आशंका बहुत कम होती है लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उसे नहीं हो सकता है.
क्या यह जन्मजात भी हो सकता है
बिल्कुल, डॉ. मधुलकर भारद्वाज ने बताया कि पैरालिसिस के होने के कई कारण होते हैं. कुछ लोगों को यह बीमारी जन्मजात होती है. ऑटोइम्युन डिजीज, मल्टीपल स्केलेरोसिस, गुलियन बैरे सिंड्रोम,एएलएस जैसी बीमारी जन्मजात होती है.
किन लोगों को है ज्यादा खतरा
जिन लोगों को हाई कोलेस्ट्रॉल, थायरॉयड, शुगर, हार्ट संबंधी जटिलताएं आदि की परेशानी है, उन लोगों को पैरालिसिस का जोखिम ज्यादा होती है. अगर किसी में जन्म से खून गाढ़ा होने की बीमारी है, किसी के हार्ट में वॉल्व खराब है, किसी के ब्लड वैसल्स में ब्लड क्लॉट बन जाते हैं, किसी की नसें खराब हो जाती है, तो ऐसे लोगों में पैरालिसिस की आशंका ज्यादा रहती है.
पैरालिसिस के लक्षण क्या हैं
प्रभावित एरिया में संवेदना में धीरे-धीरे कम होने लगती है. इससे दर्द, टेपरेचरया स्पर्श को महसूस करना मुश्किल हो सकता है. चेहरे या शरीर के कुछ हिस्सों को हिलाने में परेशानी हो सकती है. यह बोलने, चेहरे के हाव-भाव या रोज़मर्रा के काम करने की क्षमता को प्रभावित कर सकता है. इसमें मांसपेशियों में कमजोरी या ढीलापन होने लगता है. . शरीर में सुन्नापन, अकड़न, और झुनझुनी हो सकती है. डॉ. मधुलकर भारद्वाज ने बताया कि इसके लक्षण को बी फास्ट Be Fast से जोड़कर देखा जाता है. B का मतलब बैलेंस गड़बड़ा जाता है, E का मतलब आंखों में दिक्कत होती है, F का मतलब फेस टेढ़ा हो सकता है, A का मतलब आर्म यानी हाथ में ताकत की कमी हो जाती है, S का मतलब स्पीच यानी बोलने में दिक्कत होती है और T का मतलब तुरंत डॉक्टर के पास जाना होता है.
पैरालिसिस में समय पर इलाज क्यों जरूरी है
डॉ. मधुलकर भारद्वाज ने बताया कि पैरालिसिस में तत्काल इलाज बहुत जरूरी है. जिसे पैरालाइज हुआ है अगर उसे साढ़े चार घंटे के अंदर स्पेशलिस्ट न्यूरलॉजिस्ट के पास ले जाया जाए तो एक इंजेक्शन देकर इसे पूरी तरह ठीक किया जा सकता है. अगर मोटी खून की नलियों में थक्का जमा है तो वहां एक तार घुसाकर थक्के को निकाल दिया जाता है. इससे भी पूरी तरह ठीक होने की संभावना होती है. इसके बाद फिजियोथेरेपी और कुछ दवाइयों से इसे ठीक किया जा सकता है.
अगर समय पर न पहुंचे तो क्या होगा
डॉ. मधुलकर भारद्वाज कहते हैं कि अगर साढ़े चार घंटे या 12 घंटे के अंदर नहीं पहुंचा और स्ट्रोक मामूली है, आर्टरीज में कम थक्का बना है तो यह शरीर के कम हिस्से को प्रभावित करेगा लेकिन इससे क्षति निश्चित है. इसलिए समय पर इलाज बहुत जरूरी है. अगर कम डैमेज है तो डॉक्टर इंजेक्शन के माध्यम से खून के थक्के को खत्म करने की कोशिश करता है.
किस स्टेज के बाद ठीक होना मुश्किल
डॉ. मधुलकर कहते हैं कि अगर डैमेज बहुत ज्यादा है और साढ़े चार घंटे में नहीं पहुंचाया गया तो फिर इसे पूरी तरह ठीक करना बहुत मुश्किल है. लेकिन दवा, इंजेक्शन और फिजियोथेरेपी के माध्यम से खून के थक्के को हटाने की कोशिश की जाती है. अगर तीन से चार महीने के अंदर सुधार हो गया तो यह सही संकेत है लेकिन इसके बाद जिस स्थिति में मरीज है, आशंका है कि वह उसी स्थिति में रहे. फिर नसों में अकड़न कम करने की दवाई ही दी जा सकती है. पूरी तरह ठीक होना मुश्किल है. कभी-कभी चमत्कारिक रूप से ठीक हो जाए तो यह दूसरी बात है लेकिन मेडिकल साइंस में तीन से चार महीने में ही सुधार की गुजाइंश होती है.