62 वर्ष की उम्र में सुमन मेहता 300 बच्चों का बनी सहारा, नौकरी छोड़ कर रही हैं ये काम

उज्जैन: धार्मिक नगरी उज्जैन मे धर्म-कर्म के साथ कई ऐसी संस्था है जो लोगों के जीवन सवारनें का काम करती है. शहर के नानाखेड़ा क्षेत्र की रहने वाली पूर्व बैंक अधिकारी सुमन मेहता की जो अब हर किसी के लिए प्रेरणादायक है, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी का सशक्त उदाहरण भी प्रस्तुत कर रही है. स्वयं दिव्यांग होने के बावजूद उन्होंने अपनी व्यक्तिगत चुनौतियों को कभी कमजोरी नहीं बनने दिया. बेटी के जन्म के बाद जब उन्हें उसकी विशेष जरूरतों का एहसास हुआ, तभी से उनके जीवन की दिशा ही बदल गई.

लाखों का पैकेज छोड़ बनी स्पेशल बच्चों के लिए मसीहा

डॉ. सुमन मेहता, सरकारी बैंक में उच्च पद पर कार्यरत रहते हुए. लाखों रुपये की सुरक्षित नौकरी छोड़ समाज सेवा का मार्ग चुना. बीते आठ वर्षों में वह 300 से अधिक विशेष बच्चों के लिए सहारा बन चुकी हैं और उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ने का कार्य कर रही हैं. 62 वर्षीय सुमन मेहता बैंक ऑफ इंडिया में चीफ मैनेजर रह चुकी हैं और उन्हें AGM पद पर पदोन्नति भी मिली थी. बचपन में अत्यधिक बुखार के कारण उनका एक पैर डिसलोकेट हो गया, लेकिन उन्होंने कभी इसे अपने आत्मविश्वास पर हावी नहीं होने दिया. उनकी बेटी सुरभि जन्म से ही डाउन सिंड्रोम से पीड़ित है.

बेटी की परिस्थितियों को देखते हुए सुमन के मन में यह विचार आया कि समाज में ऐसे अनगिनत विशेष बच्चे हैं, जिनके माता-पिता न तो उनका उपचार करवा पा रहे हैं और न ही समुचित देखभाल. यहीं से सेवा की एक नई यात्रा शुरू हुई. 31 मार्च 2018 को उन्होंने बैंक से वीआरएस लेकर ‘सुरभि सुमन वेलफेयर फाउंडेशन सोसायटी’ की स्थापना की और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के विशेष बच्चों को कैंप के माध्यम से जोड़ना प्रारंभ किया.

300 से अधिक बच्चों को दिलाई नई पहचान

अब तक संस्था से 500 से अधिक विशेष बच्चे जुड़े हैं, जिनमें से 300 से अधिक बच्चों को नियमित प्रशिक्षण देकर आत्मनिर्भर बनाया जा चुका है. संस्था में 8 से 20 वर्ष आयु वर्ग के बच्चों को शामिल किया जाता है. यहाँ बच्चों को केवल देखभाल ही नहीं, बल्कि जनरल एजुकेशन दी जाती है, जिसमें धर्म, शिक्षा, कला, साहित्य और व्यवहारिक जीवन से जुड़े विषय शामिल हैं. इसके साथ-साथ बच्चों को त्योहारों के अनुसार उत्पाद बनाना, मिट्टी के गणेश, दीपक, आर्टिफिशियल आइटम, घरेलू कार्य और स्वरोजगार से जुड़ी गतिविधियाँ सिखाई जाती हैं, ताकि वे अपने परिवार की आर्थिक मदद कर सकें.

पेंशन से चल रहा सेवा का संकल्प

नानाखेड़ा क्षेत्र में बैंक लोन लेकर दो मंजिला भवन का निर्माण किया गया है, जिसे पूर्ण रूप से ट्रेनिंग सेंटर के रूप में विकसित किया गया है. ग्राउंड फ्लोर पर प्रशिक्षण कक्ष, प्रथम तल पर 20 बेड की व्यवस्था, किचन और वॉशरूम की सुविधा उपलब्ध है. संस्था में चार स्टाफ सदस्य कार्यरत हैं.दो स्पेशल एजुकेटर, एक केयरटेकर और एक सफाईकर्मी, बच्चों के भोजन से लेकर स्टाफ के वेतन तक, हर माह लगभग 35 से 40 हजार रुपये सुमन मेहता अपनी पेंशन से खर्च करती हैं. उनके पति राजेश मेहता, जो एक निजी कंपनी में कार्यरत हैं, इस सेवा कार्य में उनका पूरा सहयोग करते हैं.

अब अन्य राज्यों मिलेगी पहचान

अब तक उज्जैन और आसपास के क्षेत्रों के बच्चों को निशुल्क प्रशिक्षण दिया जा रहा है, लेकिन संस्था से अब महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तर प्रदेश और दिल्ली जैसे राज्यों से भी संपर्क हो रहा है. विशेष रूप से सिंगल पैरेंट्स अपनी चिंता साझा कर रहे हैं कि उनके बाद बच्चों का क्या होगा. इस चुनौती को देखते हुए सुमन मेहता ने एक नई योजना बनाई है, जिसके तहत 18 वर्ष से अधिक आयु की विशेष युवतियों को केंद्र पर लाकर उनकी आजीवन देखभाल और प्रशिक्षण किया जाएगा. इसके लिए अलग भवन निर्माण की योजना है, जिस पर प्रतिवर्ष 15 से 20 लाख रुपये का खर्च अनुमानित है. इसके लिए वह समाज के लोगों से आगे आकर जिम्मेदारी साझा करने की अपील कर रही हैं.

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