Zomato CEO Temple Device reality: हाल ही में जोमेटो, ब्लिंकिट और हाइपरप्योर की पेरेंट कंपनी एटर्नल के फाउंडर और सीईओ ने एक इंटरव्यू के दौरान कनपटी पर छोटी सी धातु की चिप चिपकाई हुई थी, जिसके बारे में पूछने पर उन्होंने जवाब दिया कि यह ‘टेंपल’ डिवाइस है जो दिमाग में खून के बहाव को रियल टाइम मापने के लिए बनाई गई है. यह बहुत ही दिलचस्प और अनोखी चीज है. हालांकि इस चिप के सामने आते ही न केवल ये सोशल मीडिया पर वायरल हो गई, बल्कि इसको लेकर लोगों में न केवल उत्सुकता दिखी बल्कि आपस में पूछने भी लगे. हालांकि अरबपतियों के इस गैजेट पर अब मेडिकल एक्सपर्ट आपत्ति जता रहे हैं. इन्हीं में से एक हैं दिल्ली के जाने-माने न्यूरोलॉजिस्ट राहुल चावला. जिन्होंने सोशल मीडिया पर ही इसे अरबपतियों का चोचला कहा.
आइए एम्स दिल्ली में ट्रेंड न्यूरोलॉजिस्ट और आईबीएस अस्पताल लाजपत नगर में कंसल्टेंट न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. राहुल चावला से ही जानते हैं कि यह डिवाइस कितने काम की है? या बाजार की एक और उपज है जो लोगों की जेब ढीली कराने के लिए बनाई गई है?
खराब रिसर्च पर आधारित है डिवाइस
डॉ. चावला ने इस डिवाइस की आलोचना करते हुए कहा कि इसमें कोई वैज्ञानिक मजबूती नहीं है, जिसकी वजह से मेडिकल जगत इसे गंभीरता से ले. लंबी उम्र जीने, स्वस्थ और जवान रहने का जुनून अरबपतियों से अजीबोगरीब और बेवकूफी भरे प्रयोग करवा रहा है और वे खुलेआम चमकदार डिवाइस पहनकर घूम रहे हैं. अगर सच में रिसर्च पर पैसा खर्च करना है तो वहां करें जहां बेहतर काम हो रहा है लेकिन यहां तो खराब रिसर्च पर आधारित डिवाइस बेचना प्राथमिकता है.
एमआरआई भी नहीं कर पाती ये काम
उन्होंने आगे कहा, ‘बिना डॉक्टरों या स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सलाह लिए ऐसी टेक्नोलॉजी पर भरोसा करना खराब है.जहां तक मुझे लगता है तो दीपिंदर द्वारा कनपटी पर लगाया गया यह डिवाइस शायद सिर्फ त्वचा के ऊपर खून के बहाव या नाड़ी में बदलाव को ही पकड़ पाता है. दिमाग के अंदर गहराई में खून के असली बहाव को मापना बहुत ही मुश्किल काम है. जिसे करने में उन्नत एमआरआई मशीनें भी पूरी तरह सक्षम नहीं हैं.जो जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध है, उसके अनुसार यह डिवाइस कनपटी वाले हिस्से से सिग्नल लेती है, जो शायद सतह पर खून के बहाव या नाड़ी में बदलाव से जुड़े होते हैं लेकिन दिमाग के अंदर असली ब्लड फ्लो को मापना कहीं ज्यादा जटिल है. मेडिकल साइंस में, MRI जैसे एडवांस टूल्स और खास रिसर्च उपकरणों की भी अपनी सीमाएं होती हैं.’
शोध की जरूरत है
डॉ. चावला आगे कहते हैं कि त्वचा पर लगाया गया इतना छोटा डिवाइस दिमाग के अंदर गहराई में खून के बहाव को भरोसेमंद तरीके से कैसे माप सकता है? ऐसा कोई प्रकाशित वैज्ञानिक अध्ययन नहीं है जो यह साबित करे कि यह डिवाइस दिमाग में खून के प्रवाह को सही-सही माप सकती है. न तो इसके कोई क्लीनिकल ट्रायल हुए हैं, न ही कोई पीयर-रिव्यू किया गया डेटा है और न ही किसी स्वतंत्र संस्था द्वारा इसकी पुष्टि हुई है. ऐसे में यह डिवाइस अभी सिर्फ एक प्रयोग है और इसे मेडिकल या एंटी-एजिंग टूल नहीं माना जा सकता.
दिमाग में होता है रेगुलेटरी सिस्टम
न्यूरोलॉजिस्ट ने समझाया कि दिमाग में एक सुरक्षा प्रणाली होती है, जिसे सेरेब्रल ऑटोरेगुलेशन कहा जाता है. यह सिस्टम तब भी दिमाग में खून का बहाव संतुलित रखता है, जब ब्लड प्रेशर ऊपर-नीचे होता रहता है. उम्र बढ़ने के साथ-साथ और हाई बीपी, डायबिटीज़, स्मोकिंग, या नींद की कमी जैसी स्थितियों में यह सिस्टम कमजोर पड़ जाता है. इससे होने वाला नुकसान धीरे-धीरे बढ़ता है और अक्सर जीवन के बाद के हिस्से में जाकर ही सामने आता है. इसलिए जब हम लंबी उम्र की बात करते हैं, तो ब्लड प्रेशर और शुगर को कंट्रोल में रखना, नियमित व्यायाम करना, पूरी नींद लेना और स्मोकिंग व शराब से दूर रहना ये सब चीज़ें दिमाग की उम्र पर किसी भी बिना साबित डिवाइस या शॉर्टकट से कहीं ज्यादा असर डालती हैं.