EPFO की ₹15,000 की सैलरी-लिमिट बढ़ाने पर विचार करे सरकार: SC ने कहा- 11 साल से नहीं हुआ बदलाव; 4 महीने में फैसला लेने का निर्देश

नई दिल्ली57 मिनट पहले

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सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को एम्प्लॉई प्रोविडेंट फंड ऑर्गेनाइजेशन (EPFO) की सैलरी लिमिट (वेज सीलिंग) बढ़ाने पर विचार करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा है कि पिछले 11 साल से इस लिमिट में कोई बदलाव नहीं हुआ है, इसलिए सरकार को अगले 4 महीने के भीतर इस पर फैसला लेना चाहिए।

फिलहाल, ₹15,000 से ज्यादा मंथली सैलरी पाने वाले एम्प्लॉई इस सोशल सिक्योरिटी स्कीम के अनिवार्य दायरे से बाहर हैं। जस्टिस जेके माहेश्वरी और जस्टिस एएस चांदुरकर की बेंच ने एक्टिविस्ट नवीन प्रकाश नौटियाल की याचिका पर यह आदेश दिया।

कोर्ट ने याचिकाकर्ता को निर्देश दिया है कि वह दो सप्ताह के भीतर केंद्र सरकार को अपना प्रेजेंटेशन सौंपें, जिस पर सरकार को समय सीमा के भीतर फैसला लेना होगा।

11 साल से सैलरी लिमिट ₹15,000 पर स्थिर

याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील प्रणव सचदेवा और नेहा राठी ने दलील दी कि EPFO की सैलरी लिमिट में आखिरी बार 2014 में बदलाव किया गया था। तब इसे ₹6,500 से बढ़ाकर ₹15,000 किया गया था।

पिछले एक दशक में महंगाई और न्यूनतम वेतन में भारी बढ़ोतरी हुई है, लेकिन EPFO की लिमिट वहीं अटकी हुई है। इसके कारण करोड़ों कर्मचारी इस सोशल सिक्योरिटी के लाभ से वंचित रह जाते हैं।

न्यूनतम वेतन से भी कम है EPFO की लिमिट

याचिका में कहा गया है कि केंद्र और कई राज्यों द्वारा तय किया गया न्यूनतम वेतन अब ₹15,000 की इस लिमिट से ज्यादा हो चुका है। ऐसे में जो कर्मचारी न्यूनतम मजदूरी पा रहे हैं, वे भी ईपीएफओ के दायरे से बाहर हो जा रहे हैं।

वकील सचदेवा ने कहा कि यह एक कल्याणकारी योजना है, लेकिन इसकी पुरानी लिमिट के कारण ज्यादातर कामगारों को इसका लाभ नहीं मिल पा रहा है।

2022 में EPFO की सब-कमेटी ने की थी सिफारिश

रिपोर्ट के अनुसार, EPFO की अपनी सब-कमेटी ने 2022 में सिफारिश की थी कि कवरेज बढ़ाने के लिए सैलरी लिमिट को बढ़ाया जाना चाहिए।

जुलाई 2022 में सेंट्रल बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज (CBT) ने भी इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी थी। याचिका में आरोप लगाया गया कि बोर्ड की मंजूरी के बावजूद केंद्र सरकार ने अब तक इस पर कोई अंतिम फैसला नहीं लिया है।

70 साल का इतिहास: पहले समावेशी थी, अब एक्सक्लूजनरी हुई

याचिका में एक स्टैटिस्टिकल एनालिसिस का हवाला देते हुए बताया गया कि पिछले 70 सालों में सैलरी लिमिट का रिवीजन किसी तय फॉर्मूले पर आधारित नहीं रहा है।

  • शुरुआती 30 साल: यह स्कीम सभी को साथ लेकर चलने वाली थी। इसका दायरा इतना बड़ा था कि इसमें लगभग हर छोटे-बड़े कर्मचारी को शामिल किया जाता था और उन्हें फायदा मिलता था।
  • पिछले 3 दशक: अब यह योजना कई कर्मचारियों को बाहर करने वाली बन गई है। सैलरी लिमिट कम होने की वजह से लोग इसके दायरे से बाहर होते जा रहे हैं।
  • पैरामीटर्स की अनदेखी: रिवीजन के वक्त रिटेल महंगाई यानी कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI), प्रति व्यक्ति आय और महंगाई दर जैसे मानकों को नजरअंदाज किया गया है।

क्या होगा बदलाव का असर?

अगर केंद्र सरकार सैलरी लिमिट को ₹15,000 से बढ़ाकर ₹21,000 या उससे ज्यादा करती है, तो संगठित क्षेत्र के लाखों नए कर्मचारी EPFO के दायरे में आ जाएंगे।

इससे उनकी रिटायरमेंट सेविंग्स बढ़ेगी और उन्हें पेंशन व बीमा (EDLI) का लाभ भी मिल सकेगा। हालांकि, इससे कंपनियों और सरकार पर वित्तीय बोझ भी बढ़ेगा, क्योंकि उन्हें भी EPF में अपना योगदान देना होगा।

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