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अगर आपका हेल्थ इंश्योरेंस क्लेम ‘नॉन-डिस्क्लोजर’ के नाम पर रिजेक्ट हो गया है, तो घबराने की जरूरत नहीं. अक्सर बीमा कंपनियां पुराने मेडिकल रिकॉर्ड या अस्पष्ट नोट्स को पुरानी बीमारी मान लेती हैं. सही दस्तावेज, टाइमलाइन और व्यवस्थित जवाब के साथ आप क्लेम को पलट सकते हैं और ओम्बड्समैन तक मदद ले सकते हैं.
हेल्थ इंश्योरेंस का क्लेम रिजेक्ट होना किसी के लिए भी तनाव भरा होता है, लेकिन जब वजह नॉन-डिस्क्लोजर बताई जाए, तो झटका और बड़ा लगता है. इसका मतलब होता है कि बीमा कंपनी मान रही है कि आपने पॉलिसी लेते वक्त अपनी सेहत से जुड़ी कोई अहम जानकारी नहीं बताई. कई बार यह सच हो सकता है, लेकिन ज्यादातर मामलों में मामला इतना सीधा नहीं होता.

अक्सर ऐसा होता है कि अस्पताल की फाइल में कोई पुराना मेडिकल नोट, ढीली-ढाली भाषा में लिखा गया इतिहास या किसी लक्षण को पुरानी बीमारी मान लिया जाता है. बीमा कंपनी इसे पहले से मौजूद बीमारी (Pre-existing Disease) मानकर क्लेम ठुकरा देती है.

जब बीमा कंपनी कहती है कि आपने कोई मैटीरियल जानकारी नहीं दी, तो उसका मतलब होता है कि अगर यह जानकारी पहले दी जाती तो पॉलिसी की शर्तें बदल सकती थीं- जैसे ज्यादा प्रीमियम, वेटिंग पीरियड या बीमारी को बाहर रखना. दिक्कत तब होती है जब ग्राहक वही बताता है जो उसे याद है या जिसका उसे पक्का पता था, जबकि बीमा कंपनी हर पुराने लक्षण या टेस्ट रिपोर्ट को बीमारी मान लेती है.
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अगर क्लेम रिजेक्शन मैसेज अस्पष्ट है तो सबसे पहले बीमा कंपनी से लिखित में डिटेल्ड रिजेक्शन लेटर मांगें. इसमें साफ लिखा होना चाहिए कि कौन-सी जानकारी नहीं बताई गई मानी जा रही है, वे किन मेडिकल दस्तावेजों के आधार पर यह कह रहे हैं और इसका मौजूदा क्लेम से क्या संबंध है. बिना यह जाने आप सही जवाब नहीं दे पाएंगे.

अब अपना प्रपोजल फॉर्म निकालिए और उस सवाल को ध्यान से पढ़िए, जिससे विवाद जुड़ा है. कई बार सवाल डायग्नोज की गई बीमारी या पिछले सालों में इलाज तक सीमित होता है. अगर पॉलिसी लेते समय बीमारी डायग्नोज ही नहीं हुई थी या कभी इलाज नहीं हुआ था, तो यह आपके पक्ष में मजबूत तर्क बन सकता है.

इस तरह के मामलों में टाइमलाइन बहुत काम आती है. एक पेज पर लिखें कि पॉलिसी कब शुरू हुई, बीमारी पहली बार कब डायग्नोज हुई, पहला इलाज कब हुआ और मौजूदा अस्पताल में भर्ती होने की तारीख क्या है. हर तारीख के साथ संबंधित दस्तावेज जोड़ें. इससे मामला साफ और मजबूत बनता है.

हर कागज भेजने की जरूरत नहीं होती. प्रपोजल फॉर्म, पॉलिसी डॉक्यूमेंट, डिस्चार्ज समरी, एडमिशन नोट्स, टेस्ट रिपोर्ट और पुराने प्रिस्क्रिप्शन सबसे अहम होते हैं. अगर पॉलिसी लेने से पहले की हेल्थ चेक-अप रिपोर्ट नॉर्मल थी, तो वह भी आपके पक्ष में मददगार हो सकती है.

कई बार अस्पताल की फाइल में Known Case Of जैसे शब्द जल्दबाजी में लिख दिए जाते हैं. इलाज करने वाले डॉक्टर से एक छोटा सा लिखित स्पष्टीकरण मिल जाए कि बीमारी नई है या पुराने रिकॉर्ड को गलत समझा गया है, तो इससे क्लेम पलटने की संभावना बढ़ जाती है.

बीमा कंपनी को जवाब देते समय भावनात्मक शिकायत न लिखें. तथ्यों के साथ बताएं कि आपने क्या बताया था, क्या नहीं जानते थे और कौन-से दस्तावेज आपकी बात साबित करते हैं. आपका जवाब जितना व्यवस्थित होगा, उतना असरदार होगा.

अगर बीमा कंपनी फिर भी नहीं मानती, तो उनके ग्रिवेंस रेड्रेसल ऑफिसर के पास जाएं. वहां भी बात न बने, तो इंश्योरेंस ओम्बड्समैन का रास्ता खुला है. सही दस्तावेज और साफ केस होने पर यहां उपभोक्ताओं को राहत मिलती है.