MP News Today: मध्य प्रदेश की धरती इतिहास, प्रकृति और विरासत का अनोखा संगम है. इसी कड़ी में रीवा का नाम आते ही शान-शौकत, किले और राजघराने की भव्यता आंखों के सामने आ जाती है. बघेल वंश के राजपरिवार द्वारा बनवाई गई इमारतें और घाट आज भी लोगों को सैकड़ों साल पीछे ले जाती हैं. इन्हीं ऐतिहासिक धरोहरों में से एक है राजघाट, जो आज भी अपनी खूबसूरती से हर किसी को मंत्रमुग्ध कर देता है.
रीवा किले के पीछे छिपा इतिहास का अनमोल खजाना
रीवा किले के पीछे, तीन नदियों के संगम के किनारे बने घाट 16वीं और 17वीं सदी की पहचान हैं. पुराने पत्थरों से बने ये घाट समय के साथ भले ही पुराने हो गए हों, लेकिन इनकी भव्यता आज भी बरकरार है. इन्हीं घाटों में सबसे खास है राजघाट, जहां कभी रीवा के राजा और शाही परिवार के सदस्य स्नान किया करते थे. आज यह घाट आम लोगों के लिए मानसिक शांति और सुकून का केंद्र बन चुका है.
कैसे पड़ा राजघाट का नाम?
रीवा के इतिहासकार असद खान बताते हैं कि वर्ष 1617 ईस्वी में महाराजा विक्रमादित्य सिंह ने रीवा को अपनी राजधानी बनाया था. इसके बाद महाराजा भाव सिंह गद्दी पर बैठे. महाराजा भाव सिंह को किले, मंदिर और घाट बनवाने का विशेष शौक था. इसी क्रम में उन्होंने 1664 ईस्वी में किले के पीछे भव्य राजघाट का निर्माण कराया. रीवा के सभी राजा इसी घाट पर स्नान करते थे, इसलिए इसका नाम राजघाट पड़ा.
तीन नदियों का संगम बनाता है इसे खास
राजघाट बिछिया, बीहर और सोन नदी के संगम के पास स्थित है. ये नदियां आगे चलकर टमस और बेलन नदी में मिलती हैं और फिर प्रयागराज में गंगा नदी से संगम करती हैं. उस दौर में घाटों का निर्माण इसलिए कराया गया था ताकि आम लोगों को भी स्नान करने में सुविधा मिल सके.
आज भी मिलता है सुकून और शांति
स्थानीय लोगों के अनुसार, राजघाट का पानी बेहद साफ है. ठंड के दिनों में भी सुबह-सुबह यहां का पानी अपेक्षाकृत गर्म रहता है. यही वजह है कि लोग दूर-दूर से यहां स्नान करने और कुछ पल शांति से बिताने आते हैं. कहते हैं, यहां बैठते ही मन अपने आप हल्का हो जाता है.
नाव की सवारी का अलग ही मज़ा
राजघाट पर नाव की सवारी भी पर्यटकों को खूब लुभाती है. महज 200 रुपये में नाविक पूरी नदी की सैर करा देते हैं. नाविक बताते हैं कि पहले यहां बड़ी नावें चला करती थीं, जिनमें एक साथ 50 से 100 लोग बैठते थे.
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