क्यों डेनमार्क ने बंद की लेटर डिलिवरी, अब लाइन में कौन से देश, क्या भारत में भी ये होगा

डेनमार्क की राष्ट्रीय डाक सेवा पोस्टनोर्ड ने 30 दिसंबर 2025 से देश में डाक पत्रों की डिलीवरी बंद कर दी है. वह ऐसा करने वाला दुनिया का पहला देश बन गया. हालांकि ये तो पक्का है कि दूसरे देश भी उसकी राह चलेंगे. स्मार्टफोन और ईमेल पर लोगों के करीब पूरी तरह निर्भर होने के बाद पुराने डाक तौरतरीकों का इस्तेमाल बहुत कम हो गया. अब हाथ से खत लिखने वाले खत्म ही होते जा रहे हैं.

पोस्टनॉर्ड ने मार्च 2025 में प्रकाशित एक बयान में कहा था कि देश में वर्ष 2000 से पत्रों की संख्या में 90% से अधिक की कमी आई है. डेनमार्क का पोस्टनार्ड अब केवल पार्सल सेवाओं को अपग्रेड करके उसको जारी रखेगा, उसको आनलाइन खरीद के हिसाब से पुख्ता करेगा. डेनमार्क ने 31 दिसंबर से अंतरराष्ट्रीय डाक वितरण भी रोक दिया.

डेनमार्क में पूरे देश में लगे 1,500 डाक बॉक्स हटा दिए गए. पोस्टनोर्ड की सेवा में लगे 4,600 कर्मचारियों में करीब 1,500 को नौकरी से निकालने का फैसला ले लिया.

डेनमार्क में करीब 200 सालों से जारी आधुनिक डाक सेवा का एक बड़ा अध्याय इस तरह खत्म हो गया. डेनमार्क के लोग तेजी से डिजिटल होते जा रहे हैं, डाक का बाजार अब लाभदायक नहीं रह गया.

अगला नंबर किन देशों का

वैसे केवल डेनमार्क ही क्यों पूरी दुनिया में डाक विभाग पत्रों की खरीदी और डिलिवरी को लेकर जबरदस्त संकट से जूझ रहे हैं. लिहाजा दुनियाभर में ये चर्चा भी तेज हो गई है कि अगला नंबर किसका होगा. कई देश इसी दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं. जैसे – नॉर्वे, स्वीडन और फिनलैंड. ये देश भी डिजिटल क्रांति में बहुत आगे हैं.

स्वीडन और नॉर्वे में तो अब हफ्ते में केवल 2 या 3 दिन ही पत्र बांटे जाते हैं. फिनलैंड में भी डिजिटल मेलबॉक्स का उपयोग इतना बढ़ गया है कि पारंपरिक डाक सेवा भारी घाटे में है.

कनाडा पोस्ट पिछले कई सालों से गंभीर वित्तीय संकट से जूझ रहा है. कनाडा में ‘कम्युनिटी मेलबॉक्स’ का मॉडल अपनाया गया है, जहां डाकिया घर तक नहीं आता, बल्कि आपको मोहल्ले के एक कॉमन बॉक्स से अपनी चिट्ठी लानी होती है. कनाडा में भविष्य में सरकारी चिट्ठी सेवा केवल पार्सल और बिजनेस मेल तक सिमट सकती है.

संयुक्त राज्य अमेरिका भले ही दुनिया की सबसे बड़ी डाक सेवा चलाता है. यहां भी पत्रों की संख्या में भारी गिरावट आई है. 2006 की तुलना में 2024 तक अमेरिका में पत्रों की डिलीवरी में 50% की कमी आई है.

भारत में क्या हालत है

भारत में डाक सेवा की स्थिति डेनमार्क जैसे देशों से बिल्कुल अलग है. जहां दुनिया के कई हिस्सों में डाक सेवाएं सिमट रही हैं, भारत में यह विभाग खुद को एक ‘लॉजिस्टिक्स और बैंकिंग जायंट’ के रूप में बदल रहा है.

पोस्टकार्ड, अंतरदेशीय और लिफाफों की बिक्री गिरी

ये बात सही है कि भारत में पोस्टकार्ड, अंतरदेशीय और लिफाफों की बिक्री जबरदस्त तरीके से गिरी है. 50 पैसे में आने वाले पोस्टकार्ड का आज भी ग्रामीण इलाकों और सरकारी अभियानों में उपयोग होता है. वैसे इसका व्यक्तिगत उपयोग अब ना के बराबर है.

अंतरदेशीय पत्र की बिक्री में सबसे ज्यादा गिरावट देखी गई है क्योंकि स्मार्टफ़ोन और व्हाट्सएप ने इसकी जगह ले ली. लिफाफे का उपयोग अब भी आधिकारिक दस्तावेजों, अदालती कागजों और राखी/बधाई संदेशों के लिए किया जा रहा है. हैरानी की बात यह है कि जहां व्यक्तिगत चिट्ठियां कम हुई हैं, वहीं स्पीड पोस्ट और रजिस्टर्ड लेटर्स की संख्या बढ़ी है.

डाक विभाग का राजस्व बढ़ा

आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2024-25 में भारत में स्पीड पोस्ट और रजिस्टर्ड पत्रों से होने वाला राजस्व बढ़ा है. वित्त वर्ष 2024-25 में यह राजस्व बढ़कर लगभग ₹2,353 करोड़ तक पहुंच गया. बैंक कागजात, पासपोर्ट, आधार कार्ड, चेकबुक और सरकारी नोटिसों की डिलीवरी अब भी डाक विभाग के जरिए ही होती है, जिससे इसकी प्रासंगिकता बनी हुई है.

डाक विभाग ने सितंबर 2025 से पुरानी ‘रजिस्ट्री’ सेवा को स्पीड पोस्ट में मिला दिया गया है. अब डाक विभाग का पूरा फोकस ‘ट्रैकिंग’ वाली सेवाओं पर है. भारत में निकट भविष्य में पत्र सेवा के बंद होने की कोई स्थिति नहीं दिखती. गांव की आबादी अब भी काफी हद तक इस पर निर्भर है.

लॉजिस्टिक पॉवरहाउस बन रहा डाक विभाग

सरकार डाक विभाग को एक “लॉजिस्टिक्स पावरहाउस” बना रही है. अब फोकस केवल चिट्ठी पर नहीं, बल्कि ई-कॉमर्स के पार्सल गांव-गांव पहुंचाने पर है. जनवरी 2026 से डाक विभाग ने “24-घंटे और 48-घंटे गारंटीड डिलीवरी” सेवा शुरू की है, ताकि वह प्राइवेट कूरियर कंपनियों को कड़ी टक्कर दे सके.

आधुनिक डाक सेवा कितनी पुरानी

आधुनिक डाक सेवा के बारे में माना जाता है कि वो वर्ष 1840 में ब्रिटेन में शुरू हुई थी. सर रोलैंड हिल ने दुनिया का पहला डाक टिकट ‘पेनी ब्लैक’ जारी किया था.

कैसे प्रोमोट किया जा रहा हाथ से खत लिखना

दुनिया में लगातार मजबूत हो रहे डिजिटल युग के बीच हाथ से पत्र लिखने की कला को बचाने के लिए कई बड़े अभियान चल रहे हैं.

– भारतीय डाक विभाग हर साल राष्ट्रीय स्तर पर “ढाई आखर” पत्र लेखन प्रतियोगिता आयोजित करता है, इसका उद्देश्य नई पीढ़ी को पत्रों की विरासत से जोड़ना है. इस साल का विषय “लिखने का आनंद: डिजिटल युग में पत्रों का महत्व” रखा गया है. इसमें जीतने वालों को सर्कल स्तर पर ₹25,000 और राष्ट्रीय स्तर पर ₹50,000 तक के नकद पुरस्कार दिए जाते हैं.

– हर साल दुनियाभर में 1 सितंबर को वर्ल्ड लेटर राइटिंग डे मनाया जाता है. ऑस्ट्रेलियाई लेखक रिचर्ड सिम्पकिन ने 2014 में इसकी शुरुआत की थी. इसका मकसद लोगों को एक दिन के लिए कीबोर्ड छोड़कर पेन और पेपर उठाने के लिए प्रेरित करना है. इस दिन दुनिया भर के स्कूलों में बच्चों को पत्र लिखना सिखाया जाता है.

– एमनेस्टी इंटरनेशनल हर साल दुनियाभर में एक कार्यक्रम चलाता है – ‘राइट फॉर राइट्स’. यह दुनिया का सबसे बड़ा मानवाधिकार पत्र-लेखन अभियान है.
इसमें हर साल दुनिया भर के लाखों लोग उन लोगों के समर्थन में हाथ से पत्र लिखते हैं जिनके साथ अन्याय हुआ है या जिन्हें जेल में डाल दिया गया है. एमनेस्टी का मानना है कि हाथ से लिखे हजारों पत्र सरकारों पर डिजिटल ईमेल की तुलना में अधिक दबाव डालते हैं.

– एक अभियान पोस्टक्रॉसिंग है. ये एक वैश्विक ऑनलाइन प्रोजेक्ट है जो लोगों को दुनिया भर के अजनबियों से हाथ से लिखे पोस्टकार्ड प्राप्त करने और भेजने की अनुमति देता है. आप एक पोस्टकार्ड भेजते हैं और बदले में आपको दुनिया के किसी भी कोने से एक अनजान व्यक्ति का हाथ से लिखा पोस्टकार्ड मिलता है.

– एक वैश्विक संगठन है – द वर्ल्ड नीड्स मोर लव लेटर्स , जो उन लोगों को हाथ से लिखे ‘प्यार भरे पत्र’ भेजने का अभियान चलाता है जो जीवन में कठिन समय, बीमारी या अकेलेपन से गुजर रहे हैं. कोई भी व्यक्ति इनके साथ जुड़कर किसी अनजान दुखी व्यक्ति को सांत्वना भरा पत्र लिख सकता है.

हाथ से पत्र लिखने के फायदे

– पत्र लिखना एक ‘मेडिटेशन’ की तरह है क्योंकि यह आपको धीमा होने का मौका देता है.
– शोध बताते हैं कि हाथ से लिखने से याददाश्त तेज होती है और रचनात्मकता बढ़ती है.
– व्हाट्सएप मैसेज डिलीट हो सकते हैं, लेकिन पत्र दशकों तक सहेज कर रखे जा सकते हैं.

दुनिया की सबसे बड़ी डाकघर बिल्डिंग

दुनिया की सबसे बड़ी डाकघर बिल्डिंग अमेरिका के शिकागो शहर में है जो अब करीब बंद सी स्थिति में है. ये ‘ओल्ड शिकागो मेन पोस्ट ऑफिस के नाम से जाना जाता है. यह केवल एक इमारत नहीं, बल्कि इंजीनियरिंग का एक अजूबा है. ये बिल्डिंग लगभग 25 लाख से 28 लाख वर्ग फुट के बड़े एरिया में फैली हुई है. इसका निर्माण 1921 में शुरू हुआ था और 1932 में इसे विस्तार दिया गया.

1997 में डाक विभाग ने इसे खाली कर दिया. करीब 20 साल तक यह खंडहर जैसी पड़ी रही. हाल ही में करीब 800 मिलियन डॉलर (करीब 6,600 करोड़ रुपये) खर्च करके इसका कायाकल्प किया गया. अब ये एक ‘मल्टी-यूज़ बिजनेस हब’ बन चुकी है. अब यहां दुनिया की दिग्गज कंपनियों के दफ्तर हैं, जैसे – उबेर, वालग्रीन्स, पेप्सीको, सिस्को और फेरारी कैंडी.

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