डिलीवरी के बाद भी महिलाएं जरूर कराएं अल्ट्रासाउंड, मुंबई की डॉक्टर ने बताई वजह, गलती पड़ सकती है भारी !

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Postpartum Ultrasound Benefits: प्रेग्नेंसी के दौरान महिलाओं का कई बार अल्ट्रासाउंड किया जाता है, लेकिन डिलीवर के बाद अधिकतर फीमेल्स कोई जांच नहीं कराती हैं. डॉक्टर्स की मानें तो डिलीवरी के बाद पोस्ट-प्रेग्नेंसी अल्ट्रासाउंड मां की सेहत के लिए जरूरी होता है. इससे गर्भाशय, अंडाशय और पेट की मांसपेशियों की स्थिति को समझने में मदद मिलती है. इसके अलावा शरीर में छिपी हुई कॉम्प्लिकेशंस को समय रहते पहचानने में मदद मिलती है.

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डिलीवरी के एक महीने बाद महिलाओं को अल्ट्रासाउंड कराना चाहिए.

Post-Pregnancy Sonography: गर्भावस्था के दौरान महिलाओं की हेल्थ की सख्त मॉनिटरिंग की जाती है. हर ट्राइमेस्टर में अल्ट्रासाउंड, ब्लड टेस्ट समेत कई तरह की जांच कराई जाती हैं, ताकि किसी भी परेशानी का वक्त रहते पता चल सके. बच्चे के जन्म के बाद अधिकतर महिलाएं कोई जांच नहीं कराती हैं. उन्हें लगता है कि डिलीवरी के बाद पोस्ट-प्रेग्नेंसी या पोस्टपार्टम सोनोग्राफी जरूरी नहीं होती है. हेल्थ एक्सपर्ट्स की मानें तो सभी महिलाओं को डिलीवरी के बाद भी एक बार अल्ट्रासाउंड जरूर कराना चाहिए. इससे महिलाओं की रिकवरी की सटीक जानकारी मिलती है और किसी भी कॉम्प्लिकेशन का पता लग जाता है.

मुंबई के मदरहुड हॉस्पिटल की कंसल्टेंट ऑब्सटेट्रिशियन एंड गायनेकोलॉजिस्ट डॉ. अनुजा थॉमस ने TOI को दिए एक इंटरव्यू में बताया कि अल्ट्रासाउंड सिर्फ प्रेग्नेंसी तक सीमित नहीं होना चाहिए. डिलीवरी के बाद भी यह जांच मां की पूरी रिकवरी को समझने में मदद करती है. इससे यह देखा जा सकता है कि गर्भाशय, अंडाशय और आसपास के ऑर्गन अपनी सामान्य स्थिति में लौट रहे हैं या नहीं. कई बार ऐसी कॉम्प्लिकेशंस होती हैं, जिनके शुरुआती लक्षण दिखाई नहीं देते हैं, लेकिन बाद में परेशानी बढ़ जाती है. ऐसे में अल्ट्रासाउंड से समय रहते उनका पता चल सकता है.

डॉक्टर ने बताया कि आजकल डिलीवरी के बाद ज्यादा या लंबे समय तक ब्लीडिंग होने की समस्या बढ़ गई है. कई महिलाएं इसे सामान्य मानकर अनदेखा कर देती हैं, लेकिन इसके पीछे गर्भाशय का सही तरीके से सिकुड़ न पाना या प्लेसेंटा के कुछ हिस्सों का अंदर रह जाना हो सकता है. पोस्टपार्टम अल्ट्रासाउंड ऐसी स्थितियों की पहचान करने में बेहद कारगर है. समय पर इलाज न मिलने पर यह इंफेक्शन, खून की कमी या इमरजेंसी स्थिति भी पैदा कर सकता है. अल्ट्रासाउंड सिर्फ ब्लीडिंग तक ही सीमित नहीं है. डिलीवरी के बाद पेट और पेल्विक एरिया में दर्द, सूजन या असहजता महसूस होना भी किसी अंदरूनी समस्या का संकेत हो सकता है. अल्ट्रासाउंड से ओवरी सिस्ट, फाइब्रॉइड, फ्लूइड कलेक्शन या पेल्विक मास जैसी समस्याओं का पता लगता है.

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डॉ. अनुजा थॉमस के अनुसार डिलीवरी के 4 से 6 हफ्तों के भीतर डॉक्टर की सलाह से पोस्टपार्टम अल्ट्रासाउंड करवा लेना चाहिए. गर्भावस्था के दौरान पेट की मांसपेशियां काफी खिंच जाती हैं, जिससे डायस्टेसिस रेक्टी में दूरी बढ़ने की समस्या हो सकती है. अल्ट्रासाउंड इस स्थिति को सही तरीके से समझने में मदद करता है. इससे डॉक्टर यह तय कर पाते हैं कि महिला को खास एक्सरसाइज या फिजियोथेरेपी की जरूरत है या नहीं. अल्ट्रासाउंड पूरी तरह सुरक्षित होता है और कुछ मिनट में हो जाता है. पोस्ट-प्रेग्नेंसी अल्ट्रासाउंड नई मां के स्वस्थ और सुरक्षित भविष्य की दिशा में एक जरूरी कदम है.

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अमित उपाध्याय

अमित उपाध्याय News18 Hindi की लाइफस्टाइल टीम के अनुभवी पत्रकार हैं, जिनके पास प्रिंट और डिजिटल मीडिया में 9 वर्षों से अधिक का अनुभव है। वे हेल्थ, वेलनेस और लाइफस्टाइल से जुड़ी रिसर्च-बेस्ड और डॉक्टर्स के इंटरव्…और पढ़ें

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डिलीवरी के बाद भी महिलाएं जरूर कराएं अल्ट्रासाउंड, मुंबई की डॉक्टर ने बताई वजह

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