जमशेदपुर : झारखंड में जमशेदपुर की रहने वाली शोमा और डालियां ने अपने हुनर और मेहनत के बल पर पारंपरिक बाटिक प्रिंट को नई पहचान दी है. कभी सीमित दायरे में पहचाना जाने वाला यह प्रिंट आज इनके प्रयासों से न सिर्फ जमशेदपुर, बल्कि पूरे देश और विदेशों तक पहुंच चुका है. दोनों ने मिलकर जमशेदपुर में बाटिक प्रिंट का काम शुरू किया और धीरे-धीरे यह शौक एक सफल व्यवसाय में बदल गया.
शोमा बताती हैं कि बाटिक प्रिंट एक खास और बेहद पारंपरिक कला है, जिसमें कपड़े पर डिजाइन उकेरने के लिए मॉम (वैक्स) और रेज़िन को गर्म करके इस्तेमाल किया जाता है. पहले कपड़े पर मनचाहा डिजाइन बनाया जाता है, फिर उसे डाई में डुबोया जाता है. जहां-जहां मोम लगी होती है. वहां रंग नहीं चढ़ता और बाकी हिस्सों में रंग भर जाता है. इसके बाद मोम हटाकर कपड़े को अंतिम रूप दिया जाता है. यह पूरी प्रक्रिया हाथ से की जाती है, इसलिए हर कपड़ा अपने-आप में अलग और खास होता है.
पूजा-पाठ में इसे ज्यादा पहनते हैं लोग
इस प्रिंट की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह देखने में बेहद ऑथेंटिक और पारंपरिक लगता है. शोमा बताती हैं कि बाटिक प्रिंट का इतिहास काफी पुराना है और यह रवींद्रनाथ टैगोर के समय से ही लोकप्रिय रहा है. पूजा-पाठ, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और खास अवसरों पर लोग इसे पहनना ज्यादा पसंद करते हैं. क्योंकि यह भारतीय परंपरा और कला को दर्शाता है.
हस्तनिर्मित कपड़ों की बढ़ी है डिमांड
वहीं, डालियां बताती हैं कि बाटिक प्रिंट सिर्फ खूबसूरत ही नहीं, बल्कि बेहद टिकाऊ भी होता है. अगर कपड़े को सही तरीके से धोया और संभाल कर रखा जाए, तो इसका रंग 10 साल तक भी फीका नहीं पड़ता है. यही वजह है कि दूर से देखने पर भी यह कपड़ा बेहद खास और अलग नजर आता है. आज के समय में लोग मशीन से बने कपड़ों के बजाय ऐसे हस्तनिर्मित कपड़ों की ओर फिर से लौट रहे हैं.
जानें इसकी कीमत
अगर हम इसके कीमत की बात करें, तो बाटिक प्रिंट आम लोगों की पहुंच में है. एक खूबसूरत बाटिक साड़ी ₹1000 में आसानी से मिल जाती है. वहीं, ब्लाउज की कीमत ₹400 से ₹500 के बीच रहती है. इसके अलावा सूट-सलवार, दुपट्टा और यहां तक कि शॉल में भी बाटिक प्रिंट तैयार किया जा रहा है, जिसे लोग खूब पसंद कर रहे हैं.
आज शोमा और डालियां के बनाए बाटिक प्रिंट कपड़ों की मांग लगातार बढ़ रही है. देश के अलग-अलग शहरों से तो ऑर्डर आते ही हैं. साथ ही विदेशों से भी लोग इनकी कला को पसंद कर रहे हैं. यह कहानी न सिर्फ महिला उद्यमिता की मिसाल है. बल्कि यह भी दिखाती है कि अगर पारंपरिक कला को सही मंच मिले, तो वह वैश्विक पहचान बना सकती है.
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