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Do Blue Light Glasses Really Work: आजकल अधिकतर लोग कंप्यूटर, लैपटॉप या स्मार्टफोन का खूब इस्तेमाल करते हैं. इन सभी डिवाइस की स्क्रीन से ब्लू लाइट निकलती है, जिसे आंखों के लिए नुकसानदायक माना जाता है. ब्लू लाइट से आंखों को बचाने के लिए कई कंपनियां ब्लू लाइट ग्लासेस बेच रही हैं और दावा कर रही हैं कि इससे ब्लू लाइट से पूरा बचाव हो सकता है. हालांकि डॉक्टर्स की मानें तो अधिकतर ऐसे चश्मे ब्लू लाइट से केवल 5 से 15% तक ही बचाते हैं. आंखों को हेल्दी रखने के लिए सभी को स्क्रीन का इस्तेमाल कम करना चाहिए और समय-समय पर ब्रेक लेना चाहिए.
दुनिया तेजी से बदल रही है और अब अधिकतर जगहों पर डिजिटलाइजेशन हो रहा है. आज के डिजिटल दौर में मोबाइल, कंप्यूटर, लैपटॉप और टीवी हमारी जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं. लंबे समय तक स्क्रीन देखने से आंखों में थकान, जलन और सिरदर्द जैसी समस्याएं भी हो रही हैं, जिसे ब्लू लाइट का साइड इफेक्ट माना जाता है. दरअसल अधिकतर स्क्रीन्स से ब्लू लाइट निकलती है, जो हमारी आंखों पर बुरा असर डालती है. ऐसे में लोग ब्लू लाइट से बचने के लिए ब्लू लाइट ग्लासेस यानी चश्मा लगाते हैं, ताकि आंखों को नुकसान न हो.

ब्लू लाइट ग्लासेस को आंखें हेल्दी रखने में कारगर बताकर मार्केट में खूब बेचा जा रहा है. तमाम कंपनियां ब्लू लाइट ग्लासेस को 100% असरदार बताती हैं और लोग इन चश्मों को खरीदकर इस्तेमाल भी कर रहे हैं. दावा किया जाता है कि ये चश्मे आंखों को नुकसान से बचाते हैं और नींद भी बेहतर करते हैं. हालांकि कई नेत्र रोग विशेषज्ञ इन दावों से सहमत नहीं हैं. हाल ही में आई स्पेशलिस्ट डॉ. सुरभि जोशी कापड़िया ने ब्लू लाइट ग्लासेस को मार्केटिंग स्कैम बताया, जिससे इस विषय पर बहस तेज हो गई है. अब सवाल है कि क्या वाकई ब्लू लाइट ग्लासेस आंखों को ब्लू लाइट से बचाते हैं? चलिए इसकी हकीकत जान लेते हैं.

साइंटिफिट फैक्ट की बात करें तो स्क्रीन से निकलने वाली ब्लू लाइट इतनी पावरफुल नहीं होती है कि वह आंखों को परमानेंट नुकसान पहुंचा सके. मोबाइल, लैपटॉप या टीवी से निकलने वाली ब्लू लाइट सूरज की रोशनी के मुकाबले बेहद कमजोर होती है. सूरज की रोशनी में कहीं ज्यादा एनर्जी होती है, लेकिन फिर भी सामान्य परिस्थितियों में इससे स्वस्थ आंखों को नुकसान नहीं होता है. अब तक वैज्ञानिक शोध यह साबित नहीं कर पाए हैं कि स्क्रीन की ब्लू लाइट से आंखों की बीमारी या परमानेंट डैमेज होती है.
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हेल्थ एक्सपर्ट्स की मानें तो ज्यादातर ब्लू लाइट ग्लासेस केवल 5 से 15 प्रतिशत तक ही ब्लू लाइट को रोक पाते हैं. इतनी कम मात्रा आंखों की सेहत पर कोई बड़ा असर नहीं डालती है. इन चश्मों के पीले रंग के लेंस आंखों को थोड़ी राहत का अहसास जरूर देते हैं, लेकिन यह राहत ज्यादातर मानसिक होती है. मेडिकली यह फायदा साबित नहीं हो सका है. इन चश्मों की ज्यादा कीमत अक्सर ब्रांडिंग के लिए होती है.

अब तक ऐसा कोई ठोस क्लीनिकल प्रूफ नहीं मिला है, जो यह साबित करे कि ब्लू लाइट ग्लासेस मोतियाबिंद, रेटिना डैमेज या उम्र से जुड़ी आंखों की समस्याओं को रोकते हैं. ये चश्मे न तो ड्राई आई डिजीज का इलाज हैं और न ही आंखों की रोशनी कम होने से बचाते हैं. आंखों के डॉक्टर्स का मानना है कि सही आदतें और लाइफस्टाइल किसी भी खास लेंस से कहीं ज्यादा प्रभावी होती है.

लोगों को स्क्रीन के कारण आंखों में जलन, ड्राइनेस, धुंधलापन या सिरदर्द महसूस होता है. इसका कारण ब्लू लाइट नहीं, बल्कि डिजिटल आई स्ट्रेन है. लंबे समय तक स्क्रीन देखने पर हम कम पलक झपकाते हैं, जिससे आंखें ड्राई होने लगती हैं. इसके अलावा आंखों की मांसपेशियों पर लगातार तनाव बना रहता है. गलत बैठने के पोश्चर से गर्दन और कंधों में खिंचाव होता है, जो सिरदर्द की वजह बन सकता है. ब्लू लाइट को दोष देना असली समस्या से ध्यान भटका देता है.

आंखों की थकान से बचने के लिए कुछ सरल उपाय ज्यादा कारगर साबित होते हैं. जैसे 20-20-20 नियम. हर 20 मिनट में 20 फीट दूर 20 सेकंड तक देखें और पलक झपकाएं. सही नंबर का चश्मा पहनना भी जरूरी है, क्योंकि हल्की सी पावर की गड़बड़ी भी आंखों पर जोर डालती है. स्क्रीन के आसपास सही रोशनी रखें, न बहुत अंधेरा हो और न तेज चमक. अगर आंखों में ज्यादा ड्राइनेस रहती है, तो डॉक्टर की सलाह से लुब्रिकेटिंग आई ड्रॉप्स का इस्तेमाल किया जा सकता है.

अब सवाल है कि लोग ब्लू लाइट ग्लासेस महंगे होने के बाद भी क्यों खरीद लेते हैं? एक्सपर्ट्स की मानें तो ब्लू लाइट ग्लासेस का मिथक इसलिए बना हुआ है, क्योंकि यह आसान और सुरक्षित समाधान जैसा महसूस होता है. सच्चाई यह है कि आंखों की सेहत किसी शॉर्टकट से नहीं, बल्कि सही आदतों से बेहतर होती है. जब लोग आंखों को नियमित आराम देते हैं, ज्यादा पलक झपकाते हैं, सही पोस्चर अपनाते हैं और स्क्रीन टाइम संतुलित करते हैं, तो आंखों की परेशानी कम हो जाती है.