MP में गेहूं की फसल पर खतरा! पहली सिंचाई के बाद पीलापन दिखे तो तुरंत करें ये काम

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Wheat Care Tips: कृषि वैज्ञानिक डॉक्टर वेद प्रकाश सिंह के अनुसार इस समय गेहूं की फसल में रोगों का खतरा बढ़ गया है. ठंड, अधिक नमी और कोहरे के कारण पीला रतुआ, पत्ती झुलसा, करपा और जड़ सड़न जैसी बीमारियां तेजी से फैल सकती हैं.खेतों में लक्षण दिखते ही अनुशंसित फफूंदनाशक का छिड़काव करें, ताकि फसल को नुकसान से बचाया जा सके.

मध्य प्रदेश देश के बड़े गेहूं उत्पादक राज्यों में शामिल है. रबी सीजन के तहत नवंबर में बोई गई गेहूं की फसल को अब करीब एक महीना हो चुका है. विंध्य क्षेत्र समेत प्रदेश के कई हिस्सों में इस समय पहली सिंचाई का दौर चल रहा है. यही वह स्टेज है, जब गेहूं की फसल रोगों और पोषक तत्वों की कमी के प्रति सबसे ज्यादा संवेदनशील हो जाती है.

ठंड, नमी और कोहरा बढ़ा रहे खतरा
कृषि वैज्ञानिक डॉ. वेद प्रकाश सिंह के मुताबिक, ठंड के मौसम में नमी और कोहरे के कारण रोगजनक तेजी से सक्रिय हो जाते हैं. इस दौरान पीला रतुआ, पत्ती झुलसा, करपा और जड़ सड़न जैसी बीमारियां गेहूं की फसल को भारी नुकसान पहुंचा सकती हैं. अगर समय रहते पहचान और नियंत्रण नहीं किया गया, तो पैदावार पर सीधा असर पड़ता है.

पहली सिंचाई के बाद पीलापन क्यों आ रहा है?
डॉ. सिंह बताते हैं कि इन दिनों कई किसानों के खेतों में पहली सिंचाई के बाद गेहूं की पत्तियां पीली पड़ने लगी हैं. यह इस बात का संकेत हो सकता है कि फसल को जरूरी पोषक तत्व नहीं मिल पा रहे हैं. आमतौर पर पहली सिंचाई बुवाई के 20–25 दिन के भीतर की जाती है और इसके बाद फसल को संतुलित खाद की सख्त जरूरत होती है.

खाद की कमी और जलभराव बन रहे बड़ी वजह
कई बार किसान सिंचाई तो सही समय पर कर लेते हैं, लेकिन उर्वरकों का संतुलित इस्तेमाल नहीं कर पाते. नतीजा यह होता है कि पौधों को पूरा पोषण नहीं मिल पाता और पत्तियों में पीलापन दिखने लगता है.इसके अलावा खेत में पानी का लंबे समय तक भरा रहना भी बड़ी समस्या है. जलभराव की स्थिति में जड़ों को ऑक्सीजन नहीं मिल पाती, जिससे पौधों की बढ़वार रुक जाती है.

इन पोषक तत्वों की कमी से बढ़ती है समस्या
विशेषज्ञों के अनुसार जिंक, सल्फर, नाइट्रोजन और आयरन जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी से गेहूं की फसल कमजोर हो जाती है. खासतौर पर जिंक की कमी पत्तियों के पीलेपन की बड़ी वजह बनती है.

किसानों के लिए क्या है समाधान?
डॉ. सिंह की सलाह है कि किसान प्रति एकड़ लगभग 10 किलो जिंक का प्रयोग करें. साथ ही खेत में जल निकासी की सही व्यवस्था रखें, ताकि अतिरिक्त पानी समय पर निकल सके. खेत का नियमित निरीक्षण करें और रोग या पोषक तत्वों की कमी के लक्षण दिखते ही कृषि विशेषज्ञ की सलाह लेकर उचित छिड़काव करें.

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Shweta Singh, currently working with News18MPCG (Digital), has been crafting impactful stories in digital journalism for more than two years. From hyperlocal issues to politics, crime, astrology, and lifestyle,…और पढ़ें

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