HIV संक्रमित ब्लड चढ़ाया,गंदगी,ठंड में कंबल की कमी, सतना जिला अस्पताल का मामला

सतना: इलाज के भरोसे सरकारी अस्पताल पहुँची आम जनता आज खुद को असुरक्षित महसूस कर रही है. कभी गंदगी, कभी अव्यवस्था, तो कभी संवेदनहीन स्टाफ तक तो ठीक था लेकिन अब आरोप सीधे मरीजों की जान से जुड़े हैं. सतना के सरकारी (सरदार वल्लभ भाई पटेल) जिला अस्पताल पर लगे ताज़ा आरोपों ने पूरे स्वास्थ्य तंत्र को कटघरे में खड़ा कर दिया है. पब्लिक का कहना है कि यहाँ इलाज से ज़्यादा संघर्ष करना पड़ता है, ठंड में कंबल नहीं मिलते, वार्डों में गंदगी पसरी रहती है और अब तो एचआइवी संक्रमित खून चढ़ाए जाने जैसे गंभीर मामले भी सामने आ चुके हैं. यह सिर्फ लापरवाही नहीं बल्कि यहां का सिस्टम ही फेल है.

संक्रमित ब्लड चढ़ाने से लापरवाही आई सामने

सरदार वल्लभ भाई पटेल जिला अस्पताल आरोप है कि जिला अस्पताल के ब्लड बैंक की गंभीर लापरवाही के चलते थैलेसीमिया से पीड़ित 8 से 11 साल के छह बच्चों को संक्रमित खून चढ़ा दिया गया. जिसके बाद वे एचआइवी पॉजिटिव पाए गए. मामला सामने आते ही मध्य प्रदेश सरकार ने छह सदस्यीय और केंद्र ने दो दो सदस्यीय उच्च स्तरीय जांच कमेटी गठित की है. सवाल यह है कि जिस ब्लड बैंक पर जीवन रक्षक व्यवस्था की सबसे बड़ी जिम्मेदारी होती है वहीं इतनी बड़ी चूक कैसे हो गई. पीड़ित परिवारों में डर और गुस्सा दोनों है जबकि प्रशासन अब तक जांच की बात कह रहा है.

लास्ट अपडेट में डॉ देवेन्द्र पटेल पैथोलॉजिस्ट और ब्लड बैंक प्रभारी तथा राम भाई त्रिपाठी और नंदलाल पांडे लैब टेक्नीशियन निलंबित हो चुके हैं. राज्य स्तरीय समिति का गठन डॉ. योगेश भरसट (IAS), संचालक राज्य रक्ताधान परिषद (SBTC) की अध्यक्षता मे दिनांक 16 दिसंबर को किया गया. इस कमेटी की प्राथमिक रिपोर्ट के आधार पर अभी कार्रवाई की गई है और बाकी अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है.

ब्लड बैंक के बाहर दलालों का खेल, स्टिंग में हुआ खुलासा

एचआईवी मामले के बाद प्रशासन द्वारा कराए गए एक स्टिंग ऑपरेशन ने अस्पताल के बाहर सक्रिय खून के दलालों की पोल खोल दी. आरोप है कि ये दलाल ज़रूरतमंद मरीजों के परिजनों से एक यूनिट खून के बदले ₹4,500 तक वसूल रहे थे. इस मामले में तीन लोगों की गिरफ्तारी भी हुई है. सिटी एसडीएम राहुल सिलाड़िया ने इस कार्रवाई की जानकारी स्वयं लोकल 18 को वॉट्सएप के माध्यम से दी. सवाल उठता है कि जब अस्पताल परिसर के आसपास इस तरह का अवैध नेटवर्क सक्रिय था तो जिम्मेदार अधिकारियों की नज़र अब तक क्यों नहीं पड़ी.

यह पहला मामला नहीं है जिसने अस्पताल की छवि पर सवाल खड़े किए हों. कुछ दिन पहले पुरुष सर्जिकल वार्ड का शौचालय बंद कर मरीजों को महिला वार्ड के शौचालय का उपयोग करने का निर्देश दिया गया था जिसे लेकर सोशल मीडिया पर तीखी आलोचना हुई. इसके अलावा हाल ही में एक वीडियो वायरल हुआ था जिसमें एम्बुलेंस चालक द्वारा मरीज के परिजनों से जबरन गाड़ी साफ करवाने का आरोप लगा. वीडियो बनते ही चालक के गायब होने की बात भी सामने आई थी. ये सभी घटनाएं मिलकर अस्पताल प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं.

कंजेस्टेड के साथ साफ सफाई  का आभाव

इन्हीं आरोपों की पड़ताल के लिए लोकल 18 की टीम देर रात जिला अस्पताल पहुँची और मरीजों व उनके परिजनों से बातचीत की. ऑपरेशन के लिए अपनी भाभी को लेकर आए हिमांशु बनस्कार ने बताया कि अस्पताल में जगह बेहद कंजेस्टेड है और साफ-सफाई का भी अभाव है. उन्होंने कहा कि डॉक्टर भी बस एक बार आते हैं और समय पर नहीं मिलते. के बावजूद उन्हें किसी तरह का कंबल नहीं मिला और उन्हें यह तक नहीं पता था कि अस्पताल में कंबल की सुविधा होती है.

मरीज के साथ आए शिवम ने बताया कि उन्हें कंबल तो दिया गया लेकिन उसकी हालत इतनी खराब थी कि उस पर पुराने मरीज का खून लगा हुआ दिख रहा था. पूरे परिसर में गुटखा और पान की पीक के निशान हैं जो संक्रमण का खतरा बढ़ाते हैं. एक हफ्ते से अस्पताल में भर्ती मरीज के परिजन रजनीश बंसल ने बताया कि उन्हें कंबल के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई लेकिन रात में रैन बसेरा के दलाल ज़रूर आकर रुकने के लिए परेशान करते हैं. मजबूरी में वे घर से ही कंबल और चादर लेकर आते हैं.

सतना निवासी हेमा ने कहा कि स्टाफ कोई खास जानकारी नहीं देता हालांकि डॉक्टर समय पर आ जाते हैं यह राहत की बात है. सिंधी कैम्प से आई महिलाओं ने भी बताया कि गंदगी इतनी ज्यादा है कि रात में रुकना मुश्किल हो जाता है और अपनी व्यवस्था खुद करनी पड़ती है.

अस्पताल के स्टाफ ने आरोपों से किया इंकार

वहीं अस्पताल स्टाफ ने इन आरोपों से इनकार किया. उनका कहना है कि जो मरीज कंबल मांगते हैं उन्हें दिया जाता है और रोज़ चादरें बदली जाती हैं. सुखेन्द्र साहू ने कहा कि कंबल के लिए कोई पूछने नहीं आया. आठ दिन से भर्ती प्रेमा सिंह ने बताया कि वह मैहर से रेफर होकर आई हैं और पहले से ही घर से कंबल-चादर लेकर आई थीं.

इन तमाम घटनाओं ने जिला स्वास्थ्य विभाग और अस्पताल प्रबंधन की कार्यप्रणाली पर गहरा प्रश्नचिह्न लगा दिया है. एचआइवी संक्रमित ब्लड का आरोप, दलालों की सक्रियता, बुनियादी सुविधाओं की कमी और लगातार सामने आ रहे विवाद, ये सब संकेत हैं कि सिस्टम को सिर्फ जांच नहीं बल्कि ठोस सुधार की ज़रूरत है. इलाज के लिए अस्पताल पहुँची जनता का भरोसा लौटाना अब प्रशासन के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है.

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