क्या हर साल MRI कराना जरूरी है? एलन मस्क की सलाह पर डॉक्टर कृष्णमूर्ति की खरी-खोटी, जानें इसके नुकसान

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Elon Musk Every Year MRI Advice: दुनिया के सबसे बड़े अमीर एलन मस्क ने कहा है कि अगर आप हर साल MRI करा लेंगे तो इससे भविष्य में भी आने वाली बीमारियों का पता चल जाएगा और इससे इसका इलाज कराने में आसानी होगी लेकिन देश के बड़े डॉक्टर दीपक कृष्णमूर्ति ने इसे सिरे से खारिज कर दिया. इस बात को लेकर मेडिकल जगत में बहस छिड़ गई है. आइए जानते है कि क्या वाकई हर साल एमआरआई कराने की जरूरत है.

हर साल MRI कराने को लेकर विवाद. (X से ली गई तस्वीर)

Elon Musk Every Year MRI Advice: क्या एमआरआई पहले से ही बीमारियों से बचने का तरीका है. दुनिया के सबसे बड़े अमीर एलन मस्क की मानें तो यह बात सच है. उन्होंने एक्स पर लिखा है कि अगर आप हर साल एमआरआई करा लेंगे तो आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस की मदद से आपको यह बता देगा कि आपको कौन-कौन सी बीमारियों का जोखिम है. एलन मस्क के इस सलाह के बाद मेडिकल जगत में बहस छिड़ गई है. देश के जाने-माने कार्डिलोॉजिस्ट ड़ॉ. दीपक कृष्णमूर्ति ने कहा है कि यह बेतुकी बात है. इससे कई और परेशानियां हो जाएंगी.

क्या कहा एलन मस्क ने

एलन मस्क ने एक्स पर सुझाव दिया कि अगर हर व्यक्ति का हर साल एमआरआई स्कैन कराया जाए और उसे एआई द्वारा जांचा जाए, तो इससे लोगों की सेहत बेहतर हो सकती है. इससे समय से पहले मौतों की संख्या भी कम की जा सकती है. एलन मस्क का मानना है कि हर साल पूरे शरीर का MRI स्कैन कराने से बीमारियों का जल्दी पता लगाया जा सकता है.अगर इन स्कैन की जांच आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस करे, तो लक्षण दिखने से पहले ही समस्याएं सामने आ सकती हैं. आज की तकनीकी युग में ऐसा संभव हो सकता है. शुरुआती पहचान अक्सर जान बचाती है. कैंसर जैसी घातक बीमारियों में यह सोच तार्किक और आधुनिक प्रतीत होती है. लेकिन मेडिकल जगत केवल चीजों को खोजने तक सीमित नहीं है. यह यह समझने के बारे में भी है कि कब देखना ज़रूरी नहीं है.

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दीपक कृष्णमूर्ति ने क्या कहा

डॉ. दीपक कृष्णमूर्ति ने एलन मस्क के उसी ट्वीट को टैग करते हुए कहा कि यह फालतू के प्रोसेस और जरूरत से ज्यादा जांच की रेसिपी टाइप है. डॉ. कृष्णमूर्ति ने कहा कि जो भी मरीज डॉक्टर के पास जाता है उसके मन में पहले से यह भय रहता है कि डॉक्टर ज्यादा जांच लिख देगा तो बीमारियां निकल जाएगी. वे पहले से ही मनोवैज्ञानिक रूप से डरे-सहमे रहते हैं. वे अक्सर इस बात को लेकर चिंतित रहते हैं कि कहीं उनकी ज़रूरत से ज़्यादा और बिना उचित कारण के जांचें न कर दी जाएं. ऐसे में यहां हर व्यक्ति की सालाना एमआरआई से स्क्रीनिंग करने की बात की जा रही है. यह बेहद बेतुकापन और चौंकाने वाला है.

हर साल एमआरआई कराने से क्या होगा

यह संभव है कि हर साल एमआरआई कराने से लक्षण से पहले कुछ बीमारियां निकल जाए और उसका इलाज भी हो जाए. लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है. एमआरआई में 1 मिलीमीटर तक की हर चीज सामने आ जाती है. शरीर के अंदर हमेशा कुछ न कुछ होता ही रहता है. ऐसे में हल्का सा कुछ उभार हो जाए तो यह एमआरआई में दिख जाएगा और इसे लेकर डॉक्टर और मरीज दोनों चिंतित रहेगा कि कहीं इससे कुछ हो न जाए. एक साधारण एमआरआई में छोटे सिस्ट, हल्का डिस्क उभार या सौम्य (बेनाइन) गांठें दिख सकती हैं. इनमें से ज़्यादातर कभी बीमारी में नहीं बदलतीं. लेकिन एक बार दिख जाने के बाद इन्हें नज़रअंदाज़ करना मुश्किल हो जाता है. नतीजा यह होता है कि लोग सालों तक ऐसे फॉलो-अप में फंसे रहते हैं, जो कभी खतरनाक थे ही नहीं. अगर हर व्यक्ति का हर साल स्कैन किया जाए और उसमें कुछ चीजें निकल जाए तो इसके आगे भी कई जाचों को कराने की सलाह दी जाएगी. इसके बाद विभिन्न जांचें, बायोप्सी और यहां तक कि उन प्रक्रियाओं तक ले जा सकते हैं, जिनकी शुरुआत में कोई ज़रूरत ही नहीं थी. कई मरीज पहले से ही जरूरत से ज़्यादा जांचों को लेकर चिंतित रहते हैं. ऐसे में मानसिक सुकून मिलने के बजाय लोगों को डर और भारी मेडिकल खर्च झेलना पड़ सकता है.

ज्यादा स्कैन से मनोवैज्ञानिक भय

बड़े पैमाने पर स्क्रीनिंग का एक बड़ा खतरा भावनात्मक नुकसान है. लोगों के मन में हमेशा यह भय रहेगा कि हमें यह बीमारी न हो जाए, इस दबाव में वह हमेशा दबा रहेगा. वह हमेशा मानसिक दबाव में रहेगा और उसे मानसिक रोग हो जाएगा. वास्तव में जब कोई बीमार पड़ता है तो डॉक्टरों को इस तरह से प्रशिक्षित किया जाता है कि वह लक्षणों के आधार पर बीमारी का पता कर लेते हैं कि उसे कौन सी बीमारी है. आमतौर पर डॉक्टर शुरुआत में लक्षणों के आधार पर ही दवा दे देते हैं और कई ठीक भी हो जाते हैं. कुछ मामलों में जांच की जरूरत होती है. ऐसे में हमेशा एमआरआई बीमारियों की पहचान से कहीं ज्यादा मनोवैज्ञानिक दबाव देगा.

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Lakshmi Narayan

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