कलाकारों ने अपनी प्रस्तुतियों से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।
ग्वालियर में आयोजित 101वां तानसेन समारोह के तीसरे दिन बुधवार को सायंकालीन संगीत सभाएं गायन और वादन के नाम रही। शाम की सुरमई हवाओं में घुलते संगीत ने मानो वातावरण को सुर–ताल की पवित्र अनुभूति से सराबोर कर दिया। रागों की गंभीरता, बंदिशों की सुघड़ता और
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ध्रुपद गायन के साथ सभा का आरम्भ हुआ। शारदा नाद मंदिर संगीत महाविद्यालय, ग्वालियर के विद्यार्थियों ने अपने सधे सुरीले गायन से वातावरण में दिव्य आलोक बिखेर दिया। उन्होंने राग मारू बिहाग में चौताल की रचना ‘प्रथम नाद सुर साधे’ प्रस्तुत की। हारमोनियम पर अनूप मोघे, पखावज पर संजय आफले ने संगत की। संगीत संयोजन वैशाली मोघे का रहा।
संजीव अभ्यंकर ने राग जोग सुनाया ध्रुपद के बाद अगली प्रस्तुति सुविख्यात गायक और मध्यप्रदेश शासन के राष्ट्रीय कुमार गंधर्व सम्मान से सम्मानित संजीव अभ्यंकर की रही। जिन्होंने राग जोग को चुना, जिसमें “नाही परत चित चैन जाही लागी सोही जाने सावरे की सेन” बंदिश प्रस्तुत की। तबला और हारमोनियम की संगत के साथ उन्होंने गायिकी के अंग और सुरों की कारीगरी से श्रोताओं के दिल को छू लिया।
अगली प्रस्तुति राग भिन्न षड्ज की रही, जिसमें उन्होंने अजहु ना आए सुघर प्रिय श्याम बंदिश गाई। अपनी दोनों बंदिशों से उन्होंने वातावरण को श्याममई बना दिया। इसके बाद अगली प्रस्तुति सुविख्यात मंगल वाद्य शहनाई के साधक पंडित शैलेष भागवत की रही।
जिन्होंने अपनी प्रस्तुति का शुरुआत राग शुद्ध कल्याण से किया। जिसने श्रोताओं के मन पर गहरी छाप छोड़ते हुए समारोह की इस संध्या को अविस्मरणीय बना दिया।

कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रोता मौजूद रहे।
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