80 रुपए की देसी चीज का कमाल, चंद सेकेंड में निकाला बच्चे के गले में फंसा सिक्का, धरी रह गई 15 लाख की मशीन

शिवांक द्विवेदी, सतना: कहते हैं कि सच्चा नवाचार बड़ी मशीनों या भारी बजट का मोहताज नहीं होता बल्कि ज़रूरत, संवेदना और समझ से जन्म लेता है. सतना मेडिकल कॉलेज के एक डॉक्टर ने इस कहावत को ज़मीन पर उतार कर दिखा दिया है. जहां बच्चों के गले में फंसे सिक्के निकालने के लिए 15 लाख रुपए की महंगी एंडोस्कोपी मशीन की जरूरत पड़ती है वहीं यहां महज 80 रुपए के एक साधारण उपकरण से यह काम सुरक्षित और तेज़ी से किया जा रहा है. यह कहानी है सतना मेडिकल कॉलेज के पीडियाट्रिक विभाग के एचओडी डॉ. प्रभात सिंह बघेल के उस देसी आविष्कार की है जिसने न सिर्फ बच्चों की जान बचाई, बल्कि ग्रामीण और कस्बाई स्वास्थ्य सेवाओं के लिए एक नई उम्मीद भी जगा दी.

महंगी मशीनों की मजबूरी और गरीब मरीजों की परेशानी

आमतौर पर जब कोई बच्चा गलती से सिक्का या कोई अन्य धातु की वस्तु निगल लेता है और वह आहार नली में फंस जाती है तो उसे निकालने के लिए पीडियाट्रिक एंडोस्कोपी की जरूरत पड़ती है. यह मशीन करीब 15 लाख रुपए की होती है जो ज़्यादातर जिला अस्पतालों और नए मेडिकल कॉलेजों में उपलब्ध नहीं रहती. ऐसे में गरीब और मध्यम वर्ग के परिवारों को बच्चों को बड़े शहरों में रेफर कराना पड़ता है. इलाज में देरी, सफर का तनाव और खर्च ये सभी मिलकर एक मेडिकल इमरजेंसी को और भी गंभीर बना देते हैं.

 सतना मेडिकल कॉलेज में सामने आई असली समस्या

डॉ. प्रभात सिंह बघेल लोकल 18 से बताते हैं कि जब सतना मेडिकल कॉलेज की शुरुआत हुई और उन्होंने यहां काम करना शुरू किया, तब हर महीने चार से पांच ऐसे केस सामने आते थे. इनमें ज़्यादातर बच्चे दो से तीन साल की उम्र के होते थे. सिक्का गले में फंसने से बच्चों को तेज़ दर्द, उल्टियां और कई बार चोकिंग जैसी गंभीर समस्या हो जाती थी. यह स्थिति तत्काल इलाज की मांग करती है लेकिन उस समय न तो पीडियाट्रिक एंडोस्कोप उपलब्ध था और न ही गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विभाग. ऐसे में बच्चों को मजबूरी में रीवा या जबलपुर रेफर करना पड़ता था जहां भी पीडियाट्रिक गैस्ट्रोएंटरोलॉजी की सुविधा सीमित थी.

यहीं से जन्म हुआ लो-कॉस्ट, हाई-इंपैक्ट इडिया का

इन्हीं परिस्थितियों ने डॉ. प्रभात सिंह बघेल और उनके सहयोगी डॉ. संजीव प्रजापति को कुछ अलग सोचने के लिए प्रेरित किया. दोनों ने मिलकर मेडिकल लिटरेचर का गहन अध्ययन किया और एक ऐसी तकनीक पर काम शुरू किया जिसे स्थानीय संसाधनों से अपनाया जा सके. शोध और अनुभव के आधार पर उन्होंने फॉलिस कैथेटर की मदद से सिक्का निकालने की तकनीक को मॉडिफाई किया. फॉलिस कैथेटर आमतौर पर आईसीयू और वार्ड में पेशाब निकालने के लिए इस्तेमाल होता है और यह आसानी से उपलब्ध रहता है.

 कैसे काम करती है यह तकनीक

इस तकनीक में बच्चे को बैठी हुई अवस्था में रखा जाता है. फॉलिस कैथेटर को सावधानी से मुंह के रास्ते गले में डाला जाता है. जब कैथेटर सिक्के के आगे पहुंच जाता है तब उसके छोटे से बैलून को हवा से फुलाया जाता है. इसके बाद कैथेटर को धीरे-धीरे बाहर निकाला जाता है जिससे सिक्का आसानी से बाहर आ जाता है. सबसे खास बात यह है कि इस प्रक्रिया में बच्चे को बेहोश करने की जरूरत नहीं पड़ती और पूरा प्रोसेस चंद सेकेंड्स में पूरा हो जाता है.

 दो साल में 68 बच्चे, 100 प्रतिशत सफलता
डॉ. प्रभात ने बताया कि बीते लगभग दो सालों में इस तकनीक से 68 बच्चों के गले से सिक्के सफलतापूर्वक निकाले गए हैं. इस दौरान किसी भी तरह की जटिलता सामने नहीं आई और सफलता दर 100 प्रतिशत रही. शुरुआत में इसे केवल एक विकल्प के तौर पर अपनाया गया था लेकिन जब लगातार अच्छे परिणाम मिलने लगे तो इसे रिसर्च के रूप में रिकॉर्ड किया गया. छह महीने तक साथ हिट मरीजों के परिजनों से फोन पर फॉलो-अप लिया गया जिसमें किसी भी तरह की परेशानी या साइड इफेक्ट सामने नहीं आए.

राष्ट्रीय स्तर पर मिला सम्मान
डॉ. प्रभात सिंह बघेल और डॉ. संजीव प्रजापति के इस शोध को भोपाल में आयोजित शिशुरोग विशेषज्ञों की राष्ट्रीय वार्षिक कांफ्रेंस में प्रस्तुत किया गया. 12 से 14 दिसंबर के बीच हुई इस कांफ्रेंस में एम्स ऋषिकेश, दिल्ली और भोपाल समेत देशभर के करीब 700 विशेषज्ञ शामिल हुए. जब इस लो-कॉस्ट, हाई-इम्पैक्ट रिसर्च पेपर को मंच पर रखा गया तो हॉल तालियों से गूंज उठा. जूरी ने इसे ग्रामीण और कस्बाई स्वास्थ्य सेवाओं के लिए क्रांतिकारी बताते हुए यंग फैकल्टी कैटेगरी में प्रथम पुरस्कार से नवाज़ा.

अब सतना के बच्चों को मिलेगा त्वरित इलाज
डॉ. प्रभात का कहना है कि अब यह तकनीक सतना मेडिकल कॉलेज में नियमित रूप से अपनाई जा रही है. जूनियर और सीनियर रेज़िडेंट भी इसे आसानी से कर पा रहे हैं. अब अगर कोई बच्चा रात के समय भी इस समस्या के साथ अस्पताल पहुंचता है तो उसे तुरंत सुविधा मिल जाती है. पहले जिन मामलों में रीवा या जबलपुर रेफर करना पड़ता था लेकिन अब यहीं सैंकड़ों में इलाज संभव हो गया है.

ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं के लिए एक मिसाल
बच्चों के गले में सिक्का फंसना एक गंभीर मेडिकल इमरजेंसी होती है. ऐसे में डॉ. प्रभात सिंह बघेल का यह देसी और सस्ता नवाचार न सिर्फ समय और पैसा बचा रहा है बल्कि मासूम जिंदगियों को सुरक्षित भी कर रहा है. यह उदाहरण साबित करता है कि अगर सोच नई हो और इरादे मजबूत हों तो सीमित संसाधनों में भी बड़ा बदलाव लाया जा सकता है.

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