मध्य प्रदेश क्राइम फाइल्स में आज बात बैतूल के 11 साल पुराने एक ऐसे मामले की जिसमें पुलिस कई सालों तक इसी बात को लेकर उलझी रही कि ये मर्डर था या खुदकुशी। दरअसल, पाथाखेड़ा गांव में रहने वाली एक 14 साल की नाबालिग की जली हुई लाश मिली थी।
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परिजन ने इसे खुदकुशी बताया था, लेकिन पुलिस को कुछ ऐसे क्लू मिले जिससे उसकी शक की सुई हत्या की तरफ थी, हालांकि कोई ठोस सबूत नहीं था। आखिर क्या था ये मामला और कैसे हुआ इसका खुलासा, लड़की की जान कैसे गई? पढ़िए क्राइम फाइल्स पार्ट-1
1 जनवरी 2014: नए साल का खौफनाक सवेरा नए साल की पहली सुबह बैतूल में घने कोहरे और हाड़ कंपा देने वाली ठंड के साथ आई थी। पाथाखेड़ा गांव के लोग नए साल की खुशियां मना रहे थे, लेकिन दोपहर होते-होते यह खुशी मातम में बदल गई। करीब 2:30 से 3:00 बजे के बीच, जोगेंद्र सिंह अपने घर के बाथरूम की ओर गए तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई।
अंदर उनके साले की 14 वर्षीय बेटी अंजली की लाश जली हुई हालत में पड़ी थी। अंजली अपने माता-पिता के घर से 5 किलोमीटर दूर, अपनी बुआ के घर एक हफ्ते पहले ही रहने आई थी। बेटी की मौत की खबर मिलते ही अंजली के पिता सुरेंद्र कुशवाहा और मां देवंती बदहवास हालत में जोगेंद्र के घर पहुंचे।
सुरेंद्र ने कांपते हाथों से पुलिस को फोन किया और बताया कि उनकी बेटी ने केरोसीन डालकर खुद को आग लगा ली है। उन्होंने पुलिस को यह भी बताया कि कुछ दिन पहले ही अंजली को उसके बॉयफ्रेंड रवि के साथ कुछ लोगों ने आपत्तिजनक हालत में पकड़ा था, जिसके बाद से वह सहमी हुई थी।
पुलिस के लिए यह कहानी सीधी और सरल लग रही थी, लेकिन इस कहानी में इतने मोड़ और ट्विस्ट आने वाले थे, जो किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं थे।
दो साल पहले मिले थे अंजलि और रवि इस खौफनाक अंजाम की कहानी की जड़ें दो साल पहले, साल 2012 में पनपना शुरू हुई थीं। 12 साल की अंजली उम्र की उस दहलीज पर खड़ी थी। जहां उसके भीतर शारीरिक और मानसिक बदलाव हो रहे थे। माता-पिता अपनी रोजी-रोटी की जद्दोजहद में व्यस्त रहते थे, और अंजली के अकेलेपन में उसका साथ देने के लिए पड़ोस का लड़का रवि यादव था।
रवि का अंजली के घर आना-जाना लगा रहता था। दोनों की दोस्ती कब गहरी होती चली गई, उन्हें खुद पता नहीं चला। पड़ोस में रहने की वजह से उन्हें छिप-छिपकर मिलने और बातें करने के कई मौके मिल जाते थे।
14 साल की होते-होते अंजली पूरी तरह रवि को अपना दिल दे बैठी थी। रवि भी उसकी ओर आकर्षित था। दोनों ने साथ जीने-मरने की कसमें खाईं और शादी के सपने देखने लगे। उनके घरवालों को उनकी नजदीकियों का एहसास तो था, लेकिन उन्हें यह नहीं पता था कि यह रिश्ता इतना गहरा हो चुका है।

28 दिसंबर 2013 का वो दिन जब सब कुछ बदल गया दो साल तक यह सिलसिला चलता रहा, लेकिन दिसंबर 2013 का आखिरी हफ्ता उनकी जिंदगी में एक ऐसा तूफान लेकर आया, जिसने सब कुछ तबाह कर दिया। 28 दिसंबर 2013 को कड़ाके की ठंड थी।
रवि अपनी बाइक पर अंजली को लेकर घूमने निकला। अंजली ने घर पर बैंक जाने का बहाना बनाया था। रवि उसे पाथाखेड़ा की हॉस्पिटल कॉलोनी में अपने एक दोस्त तोमर के खाली पड़े घर में ले गया।
वो कुछ पल अकेले में बिताना चाहते थे, लेकिन उनकी यह मुलाकात सार्वजनिक तमाशे में बदलने वाली थी। गांव के कुछ लोगों ने उन्हें उस घर में जाते हुए देख लिया था। देखते ही देखते मोहल्ले के लोग, आसपास के दुकानदार और यहां तक कि कुछ पुलिसकर्मी भी वहां इकट्ठा हो गए। भीड़ ने दरवाजा खटखटाया और जब नहीं खुला तो उसे तोड़कर अंदर घुस गई।
लोगों ने अंजली और रवि को आपत्तिजनक हालत में पकड़ लिया। इसके बाद जो हुआ, वह किसी भी नाबालिग के मनोबल को तोड़ने के लिए काफी था। भीड़ ने दोनों को बाहर निकाला। अंजली को तो डांट-फटकार कर घर भेज दिया गया, लेकिन रवि को पुलिस ने पकड़ लिया और उसे पूरे गांव में घुमाते हुए चौकी तक ले गई।

बदनामी की आग और परिवार का फैसला यह घटना जंगल की आग की तरह पूरे गांव में फैल गई। चाय की दुकानों से लेकर घरों की बैठकों तक, हर जगह अंजली और रवि के ही चर्चे थे। लोग तरह-तरह की बातें बना रहे थे। ‘ये लड़का, लड़की को लेकर इस घर में क्या कर रहा था? जरूर कुछ गलत कर रहा होगा।’ ऐसी बातें अंजली के परिवार के कानों तक भी पहुंच रही थीं।
बेटी की इस हरकत से समाज में अपनी इज्जत पर आंच आते देख सुरेंद्र कुशवाहा गुस्से में पड़ोसी रामबाबू यादव के घर शिकायत करने पहुंचे। उन्होंने कहा, ‘तुम्हारा लड़का रवि मेरी बेटी को घुमाने ले गया था, उसने मेरी बेटी के साथ अच्छा नहीं किया।’ रामबाबू की पत्नी ने बीच-बचाव करते हुए कहा, ‘मेरे बेटे ने कुछ गलत नहीं किया है, और अगर ऐसा कुछ हुआ भी है तो जैसा आप कहेंगे, हम वैसा ही कर लेंगे।
मैं बेटे की शादी आपकी बेटी से करने के लिए भी तैयार हूं, लेकिन बात अब शादी से कहीं आगे निकल चुकी थी। सुरेंद्र कुशवाहा अपनी बेटी के भविष्य और परिवार की इज्जत को लेकर चिंतित थे। बदनामी के इस माहौल से अंजली को दूर रखने के लिए उन्होंने उसे उसकी बुआ के घर भेज दिया।

पुलिस की जांच और उलझते सवाल 1 जनवरी को अंजली की मौत के बाद पुलिस ने जांच शुरू की। फोरेंसिक टीम ने बाथरूम से नमूने इकट्ठे किए और शव को पोस्टमॉर्टम के लिए भेज दिया। शुरुआत में पुलिस और परिवार, दोनों इसे आत्महत्या ही मान रहे थे। पिता सुरेंद्र का बयान सीधा था – बेटी बदनामी से अपमानित थी, और उसने यह कदम उठा लिया। बुआ के परिवार के सदस्यों ने भी लगभग यही बयान दिया।
इस जांच में एक पेंच था। किसी ने भी अंजली को खुद पर केरोसीन डालते या आग लगाते हुए नहीं देखा था। इसी एक पॉइंट ने आत्महत्या की थ्योरी पर एक बड़ा सवालिया निशान लगा दिया। जल्द ही, परिवार ने भी अपना रुख बदला। उन्होंने अंजली के बॉयफ्रेंड रवि और उसके भाई पर हत्या का आरोप लगा दिया।

अब पुलिस के सामने एक नहीं, बल्कि कई सवाल थे, और हर सवाल मामले को और भी उलझा रहा था
- क्या अंजली ने वाकई समाज में हुई बदनामी के डर से आत्महत्या की थी?
- क्या यह एक ‘ऑनर किलिंग’ थी, जिसमें घरवालों ने ही अपनी इज्जत बचाने के लिए बेटी की हत्या कर दी?
- क्या बॉयफ्रेंड रवि ने किसी मकसद से अंजली को रास्ते से हटाने के लिए उसकी हत्या की?
- या फिर इस मौत के पीछे कोई और था, कोई ऐसी साजिश जिसका खुलासा होना बाकी था?
एक 14 साल की लड़की की मौत अब सिर्फ एक मौत नहीं थी, बल्कि एक जटिल पहेली बन चुकी थी। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में क्या सामने आया? पुलिस की जांच किस दिशा में आगे बढ़ी? और क्यों यह मामला 11 साल तक अदालत में चलता रहा? इन सभी सवालों के जवाब इस कहानी को और भी सनसनीखेज बनाते हैं।
पढ़िए क्राइम फाइल के पार्ट-2 में पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के चौंकाने वाले खुलासे और अदालत का वो फैसला, जिसने इस कहानी को एक नया मोड़ दिया…