आलू की खेती पर झुलसा रोग? ये लक्षण दिखते ही घोल बनाकर छिड़क दें ये दवा

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Agriculture News: कृषि वैज्ञानिक मनसुख लाल ने किसान भाइयों को सलाह देते हुए कहा कि वे सिर्फ यूरिया, डीएपी और पोटाश पर निर्भर न रहें. खेत की मिट्टी को कैल्शियम, सल्फर, जिंक जैसे माइक्रो न्यूट्रिएंट्स की भी जरूरत होती है.

सीधी. मध्य प्रदेश में कड़ाके की ठंड के साथ तापमान में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है. सर्दी का मौसम आमतौर पर आलू की खेती के लिए अनुकूल माना जाता है लेकिन बीते कुछ दिनों से विंध्य क्षेत्र में सुबह शाम धुंध और घना कोहरा छाए रहने से किसानों की चिंता बढ़ गई है. मौसम में नमी और कम तापमान के कारण आलू की फसल में झुलसा रोग का खतरा तेजी से बढ़ रहा है. सीधी के कृषि वैज्ञानिक मनसुख लाल ने लोकल 18 को जानकारी देते हुए कहा कि आलू की अच्छी पैदावार लेने के लिए झुलसा रोग से बचाव बेहद जरूरी है. अगेती आलू की फसल में झुलसा रोग का प्रकोप सबसे पहले निचली पत्तियों से शुरू होता है. इस दौरान पत्तियों पर गहरे भूरे या काले रंग के कुंडलाकार छल्लेनुमा धब्बे दिखने लगते हैं.

उन्होंने कहा कि आलू की फसल के लिए पछेती झुलसा रोग और भी ज्यादा नुकसानदायक होता है. इस रोग में पत्तियां सिरे से झुलसना शुरू हो जाती हैं, जिससे यह रोग बहुत तेजी से पूरी फसल में फैल जाता है. कई मामलों में यह रोग 3 से 4 दिनों के भीतर ही फसल को खराब कर देता है.

30 से 45 दिन बाद छिड़काव जरूरी
उन्होंने आगे कहा कि आलू की फसल को अगेती और पछेती दोनों प्रकार के झुलसा रोग से बचाने के लिए बुआई के 30 से 45 दिन बाद पहला रक्षात्मक छिड़काव जरूर करें. इसके लिए जिंक मैगनीज कार्बामेंट 2.0 से 2.5 किलोग्राम को 800 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए. दूसरा और तीसरा छिड़काव 10 से 12 दिनों के अंतराल पर करना चाहिए. इसके लिए कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 2.5 से 3.0 किलोग्राम या जिंक मैगनीज कार्बामेंट 2.0 से 2.5 किलोग्राम में से किसी एक का चयन कर 800 से 900 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति हेक्टेयर में छिड़काव करना चाहिए.

माहू कीट का नियंत्रण भी जरूरी
कृषि वैज्ञानिक के मुताबिक, दूसरे और तीसरे छिड़काव के साथ माहू कीट का नियंत्रण भी जरूरी है क्योंकि इसके प्रकोप से पैदावार प्रभावित हो सकती है. इसके लिए फफूंदीनाशक के साथ डायमेथोएट 30 ईसी या मिथाइल-ओ-डेमेटान 25 ईसी एक लीटर या मोनोक्रोटोफास 36 ईसी 750 मिली प्रति हेक्टेयर मिलाकर छिड़काव करना चाहिए. उन्होंने किसानों को यह सलाह भी दी कि केवल यूरिया, डीएपी और पोटाश पर निर्भर न रहें. खेत की मिट्टी को सल्फर, कैल्शियम, जिंक जैसे माइक्रो न्यूट्रिएंट्स की भी जरूरत होती है.

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Rahul Singh

राहुल सिंह पिछले 10 साल से खबरों की दुनिया में सक्रिय हैं. टीवी से लेकर डिजिटल मीडिया तक के सफर में कई संस्थानों के साथ काम किया है. पिछले चार साल से नेटवर्क 18 समूह में जुड़े हुए हैं.

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