सतना. मध्य प्रदेश के सतना शहर के दिल में बसे सिटी कोतवाली क्षेत्र का मशहूर बैंड मार्केट आज भी विवाह, बरुआ, जुलूस और सांस्कृतिक आयोजनों की तैयारियों का पहला ठिकाना बना हुआ है. चार दशक से भी पुराने इस मार्केट की चमक आज भी उतनी ही बरकरार है, जितना पुराने दौर में हुआ करती थी. आज भी यहां रोजाना सैकड़ों लोग ढोल–नगाड़े से लेकर डीजे धमाल टीम, बग्घी, रोड लाइट, डांस ट्रूप्स आदि की बुकिंग के लिए पहुंचते हैं. दिलचस्प यह है कि यह पूरा बाजार एक तरह से सतना की लोक-सांस्कृतिक पहचान बन चुका है. यहां कई परिवार ऐसे हैं, जिनकी तीसरी पीढ़ी इसी काम को बढ़ा रही है. वेडिंग सीजन में यहां उमड़ने वाली भीड़ इस बात का सबूत है कि डिजिटल दौर में भी परंपरागत संगीत और बैंड की अपनी अलग ही चमक है.
शुरुआत में थीं सिर्फ 4–5 दुकानें
बैंड मार्केट के पुराने दुकानदार कमलेश ने लोकल 18 से कहा कि वह बचपन से यहीं काम कर रहे हैं. जब यह मार्केट शुरू हुई, तब सिर्फ 4–5 दुकानें थीं लेकिन समय के साथ यह एक बड़ा केंद्र बन गया. पिछले 25 साल से वह खुद दुकान संभाल रहे हैं और इससे पहले उनके पिता इसी मार्केट में बैठते थे. उन्होंने बताया कि यह मार्केट शहर के अन्य बाजारों की तुलना में सस्ता है क्योंकि यहां दुकानदार फुटपाथ या अस्थायी टीन शेड में बैठते हैं, जिससे खर्च कम पड़ता है और ग्राहक को भी कम दाम में बैंड बाजे की बुकिंग मिल जाती है.
एक ही जगह पर सबकुछ
10 साल से इस मार्केट में दुकान चला रहे फिरोज बनस्कार ने कहा कि यहां ग्राहकों को एक ही जगह पर डीजे, रोड लाइट, आतिशबाजी, घोड़ी, बग्घी और बैंड टीम समेत सबकुछ मिल जाता है. फरवरी, मार्च, अप्रैल और नवंबर के लगन वाले महीनों में सबसे ज्यादा भीड़ रहती है. यह मार्केट 40–50 साल से यहीं लग रही है और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से भी लोग बुकिंग के लिए आते हैं.
बदलते दौर में कम हुई बैंड की मांग
आधुनिक दौर का प्रभाव इस पुराने कारोबार पर साफ दिख रहा है. फिरोज और अन्य दुकानदारों के अनुसार, अब डीजे की मांग तेजी से बढ़ रही है और परंपरागत बैंड की बुकिंग लगातार कम होती जा रही है. बजरहा टोला के मंजीत बनस्कार ने कहा कि पहले बैंड वाले लाखों कमाते थे लेकिन अब काम घटकर 20–25 हजार रुपये तक सिमट गया है. ढोल नगाड़े की भूमिका सिर्फ शौक प्रदर्शन या खास रस्मों तक सीमित हो गई है.
नगर निगम से स्थायी दुकानों की मांग
बैंड मार्केट के कई दुकानदारों ने लोकल 18 से बातचीत में कहा कि नगर निगम अक्सर उन्हें दुकानें लगाने से रोकता है जबकि उनकी रोजी-रोटी का एकमात्र सहारा यही है. उनका कहना है कि अगर उन्हें स्थायी दुकानें मिल जाएं, तो यह मार्केट न केवल संरक्षित होगा बल्कि सतना की सांस्कृतिक पहचान भी सुरक्षित रहेगी. दुकानदारों ने अपील की है कि इस ऐतिहासिक बाजार को खत्म न होने दिया जाए और इसे एक आधिकारिक सांस्कृतिक मार्केट के रूप में विकसित किया जाए.
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