बिच्छू घास या सुपरफूड? कुमाऊं की कंडाली सब्जी की कहानी, जानिए रेसिपी और फायदे

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उत्तराखंड की पहाड़ियों में उगने वाली कंडाली अब सिर्फ गांवों तक सीमित नहीं रही. इसे सुपरफूड की उपाधि मिल रही है और शहरों में भी इसकी मांग तेजी से बढ़ रही है. स्वास्थ्य विशेषज्ञ इसे प्राकृतिक मल्टीविटामिन मानते हैं, जो सर्दियों में शरीर को गर्म और मजबूत बनाए रखता है.

बागेश्वर और कुमाऊं क्षेत्रों में कंडाली को बिच्छू घास के नाम से जाना जाता है. इसे छूते ही त्वचा में तेज जलन, खुजली और सूजन हो जाती है, इसलिए लोग इससे दूर रहते हैं. लेकिन यही घास पहाड़ों का सुपरफूड मानी जाती है. आयुर्वेदिक चिकित्सक डॉ. संगीता के अनुसार, इसमें आयरन, कैल्शियम, प्रोटीन, विटामिन A और C भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं. ठंड के मौसम में इसका साग पूरे कुमाऊं में विशेष रूप से पसंद किया जाता है. उबालने और पकाने के बाद इसकी चुभन पूरी तरह खत्म हो जाती है और यह बेहद पोषक भोजन में बदल जाती है.

Scientific secret of scorpion grass – why does it seem dangerous?

कंडाली की पत्तियों पर बेहद बारीक और नुकीले रोम होते हैं, जिनमें हिस्टामीन और फॉर्मिक एसिड जैसे रसायन पाए जाते हैं. यही त्वचा के संपर्क में आते ही तेज जलन, खुजली और सूजन का कारण बनते हैं. पहाड़ों में बच्चों को इस पौधे को छूने से विशेष रूप से रोका जाता है. दिलचस्प बात यह है कि पकाने या उबालने की प्रक्रिया में ये रसायन पूरी तरह निष्क्रिय हो जाते हैं. इसी वजह से उबली और पिसी हुई कंडाली न केवल सुरक्षित होती है, बल्कि पौष्टिकता से भरपूर भोजन बन जाती है. कुमाऊं के कई गांवों में इसे औषधीय पौधे के रूप में भी सम्मान मिलता है.

A treasure trove of nutrition – Kandali replenishes iron and calcium

पर्वतीय क्षेत्रों में कंडाली को पोषण का भंडार माना जाता है. इसमें आयरन की मात्रा इतनी अधिक होती है कि एनीमिया दूर करने में इसे बेहद कारगर माना जाता है. मौजूद कैल्शियम हड्डियों को मजबूत बनाता है, जबकि प्रोटीन शरीर को ऊर्जा प्रदान करता है. यही कारण है कि ग्रामीण इलाकों में इसे प्रसूता महिलाओं और कमजोरी से उबर रहे लोगों के लिए खास तौर पर पकाया जाता है. आधुनिक शोध भी कंडाली को ‘हिमालयन सुपरफूड’ का दर्जा देते हैं, क्योंकि यह प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है.

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Traditional plucking method - gloves and tongs are essential

कंडाली को सीधे हाथ लगाना खतरनाक हो सकता है. इसलिए पहाड़ी क्षेत्रों में इसे तोड़ने के लिए दस्ताने, मोटे कपड़े या लकड़ी का चिमटा इस्तेमाल किया जाता है. पौधा सुबह-सुबह जब नम होता है, तब इसकी पत्तियां नरम और आसानी से तोड़ी जा सकती हैं. तोड़ी गई पत्तियों को जूट की बोरी या टोकरी में रखा जाता है. ग्रामीण महिलाएं इन्हें सावधानीपूर्वक धोकर आगे की प्रक्रिया शुरू करती हैं. यह पूरी तैयारी इसलिए की जाती है ताकि पकाने तक पत्तियों की चुभन का कोई अंश न बचे.

Traditional Taste of Kandali - A Winter Special

सर्दियों में कुमाऊं में कंडाली साग बेहद पसंद किया जाता है. पहाड़ी रसोई में इसे त्योहारों और खास अवसरों पर भी बनाया जाता है. हल्का कसैला स्वाद और देसी घी के साथ इसकी खुशबू लुभावनी होती है. कई जगह इसे चैंसू दाल और बाजरे या मंडुवे की रोटी के साथ परोसा जाता है. पहाड़ों के लोग इसे ताकत बढ़ाने वाला भोजन मानते हैं, जो ठंड में शरीर को गर्म रखता है.

How to make Kandali Saag - an easy and popular recipe?

कंडाली की पत्तियों को अच्छी तरह धोकर 10–15 मिनट उबालें. उबली पत्तियों को ठंडा करके मिक्सर में पीस लें. कढ़ाई में घी गर्म करके लहसुन और प्याज को सुनहरा भूनें, हल्दी, मिर्च और नमक मिलाकर मसाला तैयार करें. पिसा साग इसमें डालकर 10 मिनट धीमी आंच पर पकाएं. अंत में एक चम्मच घी डालें. तैयार कंडाली साग पौष्टिक और स्वादिष्ट है.

Local favourites: Kamaal with roti, jhangora kheer or rice

बागेश्वर, पिथौरागढ़ और अल्मोड़ा में कंडाली साग को पारंपरिक व्यंजनों के साथ परोसा जाता है. सबसे लोकप्रिय है इसे गर्मागर्म रोटी या झंगोरे की खीर के साथ खाना. उबले चावल के साथ भी इसका स्वाद लाजवाब होता है. बुजुर्ग बताते हैं कि यह सर्दियों में शरीर को गर्म और मजबूत बनाता है.

The demand for this superfood has increased in modern times and is now gaining recognition in cities as well.

पहले कंडाली सिर्फ गांवों में जानी जाती थी, लेकिन अब यह सुपरफूड के रूप में शहरों में भी लोकप्रिय हो रही है. स्वास्थ्य विशेषज्ञ इसे प्राकृतिक मल्टीविटामिन मानते हैं. पहाड़ी जिलों में फूड प्रोसेसिंग इकाइयां कंडाली पाउडर और सूप मिक्स तैयार कर रही हैं. पर्यटन बढ़ने से बाहर से आए लोग भी इसके पारंपरिक स्वाद की तारीफ करते हैं. कंडाली अब सिर्फ घास नहीं, बल्कि उत्तराखंड की पहचान बनती जा रही है.

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