7 अनोखी दिवाली- सिक्किम का तिहार उत्सव: कौवे-कुत्ते और गाय-बैल की पूजा; मान्यता- यमुना ने यम को बुलाने इन्हें दूत के रूप में भेजा था

गंगटोक1 घंटे पहलेलेखक: प्रभाकर मणि तिवारी

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सिक्किम के अलावा दार्जिलिंग और कालिम्पोंग में भी तिहार बड़े उत्साह से मनाया जाता है।

देशभर में दीवाली को अंधकार पर प्रकाश की जीत के रूप में मनाया जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार, जब भगवान राम ने रावण पर विजय पाई और अयोध्या लौटे, तो लोगों ने दीप जलाकर उनका स्वागत किया।

सिक्किम में इस पर्व का रूप कुछ अलग है। यहां यह त्योहार तिहार के नाम से मनाया जाता है, जो प्रेम, सामाजिक सद्भाव और प्रकृति व पशुओं के प्रति कृतज्ञता की भावना का उत्सव है।

सिक्किम में तिहार 5 दिन तक चलता है। यह उत्सव मुख्य रूप से नेपाली समुदाय, जिसे यहां गोरखा कहा जाता है, द्वारा मनाया जाता है। यह त्योहार मृत्यु के देवता यम और उनकी बहन यमुना से जुड़ा है।

तिहार को दिवाली या यमपंचक भी कहा जाता है। इस पर्व में इंसानों, पशुओं और देवताओं के आपसी संबंधों को सम्मान और आभार के साथ याद किया जाता है।

गाई तिहार पर गाय की पूजा की तैयारी।

गाई तिहार पर गाय की पूजा की तैयारी।

7 रंगों का तिलक लगाकर बहनें भाई की लंबी उम्र की कामना करती हैं कुकर तिहार की पूजा

  • पहला दिन (काग तिहार)- कौवों की पूजा करते हैं। मिठाई-फल खिलाते हैं।
  • दूसरा दिन (कुकुर तिहार)- कुत्तों को नहलाकर माला पहनाकर पूजते हैं।
  • तीसरा दिन (गाई तिहार)- गायों काे माता स्वरूप मानकर पूजा की जाती है।
  • चौथा दिन (गोवर्धन पूजा)- बैलों को पूजते हैं। घर-घर देउसी गीत गाते हैं।
  • पांचवां दिन (भाई टीका)- बहनें भाइयों को सात रंगों से टीका लगाकर उनकी लंबी उम्र की कामना करती हैं, भाई उपहार देकर रक्षा का वचन देते हैं।

तिहार से जुड़ी पौराणिक कथा

एक पौराणिक कथा के अनुसार, यमुना ने अपने भाई यम को घर बुलाने के लिए कौवे, कुत्ते और गाय को दूत के रूप में भेजा था। वहीं से यह परंपरा शुरू हुई। सिक्किम के अलावा दार्जिलिंग और कालिम्पोंग में भी तिहार बड़े उत्साह से मनाया जाता है। नेवार समुदाय में इसे स्वांति कहा जाता है।

गंगटोक के पुरोहित सोमेश्वर पौड्याल बताते हैं, तिहार का सार यम और यमुना की कथा में निहित है। यमुना ने यम से वर मांगा था कि जब तक टीके का रंग न मिटे, भाई को मृत्यु न आए। इसी आशीर्वाद से भाई टीका परंपरा बनी थी।

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