एमपी में हर दिन 42 ‘केस’, 769 दिनों में 32,385 मौतें, विधानसभा में खुलासा

भोपाल. मध्य प्रदेश विधानसभा में पेश किए गए आंकड़ों ने प्रदेश की सामाजिक और मानसिक स्वास्थ्य स्थिति को लेकर गंभीर चिंता पैदा कर दी है. लिखित जवाब में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने बताया कि 13 दिसंबर 2023 से 20 जनवरी 2026 के बीच 769 दिनों की अवधि में 987 स्‍टूडेंट्स, 562 किसानों और 667 कृषि मजदूरों ने आत्महत्या की. यह आंकड़ा केवल संख्याओं का संग्रह नहीं है, बल्कि उन परिवारों की त्रासदी को दर्शाता है जो अचानक संकट में घिर गए. औसतन हर दिन एक छात्र, लगभग एक किसान और बड़ी संख्या में अन्य नागरिक इस तरह की घटनाओं में जान गंवा रहे हैं.

इसी अवधि में प्रदेश में कुल 32,385 आत्महत्या के मामले दर्ज हुए, यानी प्रतिदिन औसतन 42 लोगों ने जान दी. विधानसभा में यह जानकारी कांग्रेस विधायक राजन मंडलोई के प्रश्न के उत्तर में साझा की गई. मुख्यमंत्री ने स्वीकार किया कि कारण अलग-अलग हैं और प्रत्येक मामले की परिस्थितियां भिन्न होती हैं. हालांकि इतने बड़े आंकड़े ने शिक्षा, कृषि और मानसिक स्वास्थ्य तंत्र की प्रभावशीलता पर बहस तेज कर दी है. विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल कानून-व्यवस्था या आर्थिक मुद्दा नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक चुनौती है.

विधानसभा में सामने आए आंकड़े
मुख्यमंत्री के जवाब के अनुसार 769 दिनों में 987 स्‍टूडेंट्स ने आत्महत्या की. यह औसतन प्रतिदिन एक से अधिक छात्र के बराबर है. इसी अवधि में 562 किसानों और 667 खेत मजदूरों की आत्महत्या दर्ज की गई. किसानों से जुड़े मामलों में केवल दो घटनाएं फसल नुकसान से संबंधित बताई गईं. अन्य मामलों के कारणों का विस्तृत वर्गीकरण जवाब में उपलब्ध नहीं कराया गया. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के वर्ष 2023 के आंकड़ों के अनुसार मध्य प्रदेश में 15,662 आत्महत्याएं दर्ज हुई थीं. इसका अर्थ है कि उस वर्ष भी औसतन 42 लोग प्रतिदिन इस कदम तक पहुंचे. ताजा आंकड़े उसी प्रवृत्ति के जारी रहने का संकेत देते हैं.

छात्रों में बढ़ता मानसिक दबाव
विशेषज्ञ मानते हैं कि स्‍टूडेंट्स में परीक्षा दबाव, करियर की अनिश्चितता, पारिवारिक अपेक्षाएं और मानसिक अवसाद प्रमुख कारण हो सकते हैं. हालांकि आधिकारिक जवाब में विस्तृत कारणों का उल्लेख नहीं है, लेकिन शिक्षा क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि स्कूल और कॉलेज स्तर पर काउंसलिंग तंत्र को मजबूत करना जरूरी है. डिजिटल युग में सामाजिक तुलना और प्रतिस्पर्धा भी तनाव को बढ़ा रही है.

कृषि क्षेत्र की चुनौतियां
किसानों और खेत मजदूरों के मामलों ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था की जटिलताओं को सामने रखा है. मौसम की अनिश्चितता, बाजार मूल्य में उतार-चढ़ाव और वित्तीय दबाव लंबे समय से चर्चा का विषय रहे हैं. सरकार की ओर से विभिन्न योजनाएं संचालित की जा रही हैं, लेकिन आंकड़े संकेत देते हैं कि जमीनी स्तर पर और प्रभावी हस्तक्षेप की आवश्यकता है.

विपक्ष ने घेरा, तो सरकार ने दिया जवाब 
विधानसभा में विपक्ष ने इन आंकड़ों को सरकार की नीतिगत विफलता से जोड़ते हुए सवाल उठाए. विपक्ष ने छात्रों के लिए व्यापक मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम, किसानों के लिए आर्थिक सुरक्षा और कर्ज प्रबंधन प्रणाली को मजबूत करने की मांग की. सरकार का कहना है कि विभिन्न सामाजिक सुरक्षा और कल्याण योजनाओं के जरिए स्थिति सुधारने के प्रयास जारी हैं.

अनिवार्य मनोवैज्ञानिक परामर्श, हेल्पलाइन, जागरूकता अभियान जरूरी 
मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि केवल आर्थिक पैकेज पर्याप्त नहीं होंगे. स्कूलों में अनिवार्य मनोवैज्ञानिक परामर्श, हेल्पलाइन की सक्रियता, सामुदायिक जागरूकता अभियान और ग्रामीण क्षेत्रों में परामर्श सेवाओं का विस्तार जरूरी है. सामाजिक सहयोग और परिवारिक संवाद भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. यदि कोई व्यक्ति मानसिक तनाव या निराशा से जूझ रहा हो, तो तत्काल पेशेवर सहायता लेना आवश्यक है. समय पर संवाद और सहयोग कई जिंदगियां बचा सकता है.

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