3 साल की बच्ची का हुआ स्मार्ट कॉक्लियर इम्प्लांट, जानें इसका खर्च और प्रोसेस

जयपुर: राजस्थान के सरकारी अस्पताल में पहली बार राजस्थान यूनिवर्सिटी ऑफ़ हेल्थ साइंसेज में तीन साल की बच्ची के कान में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) पर आधारित स्मार्ट कॉक्लियर इम्प्लांट लगाया गया है. ईएनटी (ENT) विभाग के सीनियर प्रोफेसर डॉ. मोहनीश ग्रोवर ने कहा कि सर्जरी के बाद बच्ची की हालत स्थिर है और उम्मीद है कि वह लगभग 21 दिनों में सुनना और बोलना शुरू कर देगी.

उन्होंने कहा, ‘यह राजस्थान के सरकारी अस्पताल में किया गया पहला ऐसा एडवांस्ड कॉक्लियर इम्प्लांट प्रोसीजर है, और यह सुनने में दिक्कत वाले बच्चों के लिए नई संभावनाएं खोल सकता है.’

कितनी देर चला स्मार्ट कॉक्लियर इंप्लांट ऑपरेशन?

उदयपुर की रहने वाली तीन साल की बच्ची सनाया इलाज के लिए आरयूएचएस अस्पताल के ईएनटी विभाग में पहुंची थी. डॉक्टरों ने ऑपरेशन के बाद कान में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) आधारित स्मार्ट कॉक्लियर इंप्लांट किया.

डॉक्टरों ने करीब तीन घंटे की मशक्कत के बाद इस ऑपरेशन को सफलता पूर्वक पूरा किया है. डॉ. मोहनीश ग्रोवर ने बताया कि दिमागी बुखार की शिकायत के चलते बच्ची ने सुनने की क्षमता खो चुकी है. दो साल की उम्र से ही बच्ची को सुनना बंद हो गया था. ऐसे मरीजों को सुनने योग्य बनाने के लिए आधुनिक चिकित्सा प्रोसेस में कॉक्लियर इंप्लांट ही एक मात्र विकल्प माना जाता है.

डॉक्टर ने बताया कि 1000 बच्चों में 4 को कॉक्लियर इंप्लांट कराने की सलाह दी जाती है. आंकड़ो के मुताबिक पूरे राजस्थान में हर साल करीब 200 से 250 कॉक्लियर इंप्लांट किए जाते हैं. जयपुर में आरयूएचएस, एसएमएस और जयपुरिया अस्पताल का ईएनटी विभाग की टीम कॉक्लियर इंप्लांट के लिए योग्य मानी जाती है.

कॉक्लियर इंप्लांट में कितना खर्च होता है?

जब डॉक्टर किसी मरीज को कॉक्लियर इंप्लांट की सलाह देते हैं तो यह परिजनों को चिंता में डाल देती है. दरअसल कॉक्लियर इंप्लांट बेहद खर्चीला ऑपरेशन है. इस ऑपरेशन में 8 से 22 लाख रुपये खर्च आता है. प्राइवेट अस्पतालों में यह खर्च 25 लाख रुपये तक चला जाता है.

कॉक्लियर इंप्लांट में यूज डिवाइस की लाइफ कितनी होती है?

डॉक्टर बताते हैं कि कॉक्लियर इंप्लांट के दौरान कानों में लगाया जाने वाले डिवाइस की लाइफ कोई फिक्स नहीं होती है. लेकिन देखा गया है कि ऑपरेशन सफल होने पर यह औसतन 30 साल तक चलता है. हालांकि साउंड प्रोसेसर के लिए जो बैटरी यूज होती है उसकी लाइफ तीन साल की होती है. जिसे समय-समय पर चेंज करवाना होता है.

कॉक्लियर इंप्लांट में AI तकनीक से क्या फायदा?

डॉ. मोहनीश ग्रोवर के अनुसार, कॉक्लियर इंप्लांट में आर्टिफिशियल तकनीक के इस्तेमाल से मरीजों को काफी लाभ मिल रहा है. उन्होंने बताया कि पारंपरिक तरीके से होने वाली सर्जरी में एक्यूरेसी उतनी सटीक नहीं होती थी, लेकिन नई तकनीक इस कमी को दूर करती है.

इस इंप्लांट में स्मार्ट नेव टेक्नोलॉजी दी गई है, जो ऑपरेशन के दौरान सर्जन को सही पोजिशन की जानकारी देती है. साथ ही इसमें इनबिल्ट मेमोरी भी मौजूद है, जिसमें मरीज की मैपिंग और अन्य जरूरी डेटा सुरक्षित रखा जा सकता है. इसके अलावा यह तकनीक फर्मवेयर अपग्रेडेबल है, यानी स्मार्टफोन की तरह इसे समय-समय पर अपडेट किया जा सकता है.

कॉक्लियर इम्प्लांट क्या होता है?

कॉक्लियर इम्प्लांट एक विशेष प्रकार का इलेक्ट्रॉनिक उपकरण है, जो गंभीर रूप से सुनने में असमर्थ या बहुत कम सुनने वाले लोगों को आवाज महसूस कराने में मदद करता है. यह डिवाइस कान के अंदरूनी हिस्से (कॉक्लिया) को सीधे इलेक्ट्रिक सिग्नल भेजकर सुनने की प्रक्रिया को सक्रिय करता है. इसमें हाई-स्पीड प्रोसेसिंग चिप लगी होती है, जो ध्वनि को प्रोसेस कर उसकी क्वालिटी को बेहतर बनाती है.

आमतौर पर इसका इंटरनल इम्प्लांट करीब 30 साल तक प्रभावी ढंग से काम कर सकता है, जबकि बाहर लगा साउंड प्रोसेसर लगभग 3 साल तक चलता है और समय-समय पर बदला जाता है. विशेषज्ञों का मानना है कि यह आधुनिक तकनीक कम सुनने वाले बच्चों के इलाज में नई उम्मीद बनकर सामने आई है.

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