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Can Health Budget Heal India: भारत 1.40 अरब वाला देश है. यहां हर 4 में से एक वयस्क हाई बीपी का शिकार है, 10 करोड़ लोगों को डायबिटीज है और 14 लाख कैंसर के नए मामले हर साल आ जाते हैं. यानी जवान भारत का दिल बीमार है. इस बार के बजट में सरकार ने कई नई घोषणाएं की है. तो क्या बीमार भारत का दिल इस बजट से सुधरेगा.
Can Health Budget Heal India: कहने के लिए हम दुनिया का सबसे जवान देश है. हम गर्व से कहते हैं कि हमारे देश में 60 प्रतिशत युवा आबादी है. पर इस जवानी में घुन लगता दिख रहा है. सरकारी आंकड़ों को ही मानें तो यहां हर चार में से एक व्यक्ति को या तो हाई बीपी है या डायबिटीज है. हम डायबिटीज कैपिटल ऑफ वर्ल्ड कहलाते हैं. यहां 10 करोड़ से ज्यादा लोगों को शुगर की बीमारी है, 10 करोड़ से ज्यादा लोगों को हाई बीपी है. 14 लाख हर साल कैंसर के नए मरीज आ जाते है. मोटापे का तो कहना ही क्या. नॉन-कम्युनिकेबल डिजीज भारत की छाती को छलनी करने लगी है. कुल मिलाकर जवान भारत का दिल बीमार हो चुका है. अब सवाल है कि इसका इलाज क्या है. इस बार के बजट में सरकार ने कुछ ठोस कदम जरूर उठाए हैं लेकिन क्या इससे हमारी सेहत सुधरेगी.
डॉक्टरों को बजट से नई उम्मीद
सी के बिड़ला अस्पताल में इंटरनल मेडिसीन की डायरेक्टर डॉ. मनीषा अरोड़ा का कहना है कि बजट में वित्त मंत्री द्वारा बायोफार्मा शक्ति की घोषणा इस क्षेत्र को आगे बढ़ाने के लिए बहुत बड़ा कदम है. देसी उत्पादन को प्रोत्साहन देने से हमारा हेल्थसेक्टर मजबूत होगा और आम लोगों को सस्ते में इलाज उपलब्ध हो सकेगा. इसके साथ ही हम ग्लोबल बायोफार्मा हब भी बन पाएंगे. दवा प्रोडक्शन में प्रतिस्पर्धा बढ़ने से दवाओं की कीमतें और कम हो सकती हैं. इस तरह मरीजों के लिए विकल्प भी बढ़ेंगे. खासकर कैंसर, डायबिटीज और ऑटोइम्यून बीमारियों जैसे महंगे इलाज में यह पहल मरीजों के लिए राहत लेकर आ सकती है. कुल मिलाकर, यह कदम भारत में क्रोनिक बीमारियों के प्रबंधन और सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए गेम चेंजर साबित हो सकता है.
सर गंगाराम अस्पताल में मेडिकल ऑन्कोलॉजी के चेयरमैन डॉ. श्याम अग्रवाल बताते हैं कि 17 कैंसर दवाइयों पर बेसिक कस्टम ड्यूटी खत्म करना स्वागतयोग्य कदम है. इसके साथ ही 7 रेयर डिजीज की दवाइयों की कीमत कम करने के लिए भी इन्हें ड्यूटी फ्री कर दिया गया है. यह एक संवेदनशील और मानवीय कदम है, जो इलाज की लागत को सीधे तौर पर कम करेगा. इससे महंगा इलाज सस्ता हो सकेगा और आम आदमी तक इलाज सर्वसुलभ हो पाएगा. जिन लोगों को इन रेयर बीमारियों का सामना करना पड़ता है उनके परिवारों पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ को काफी हद तक कम किया जा सकेगा. पारस हेल्थ के मैनेजिंग डायरेक्टर और फिक्की हेल्थकेयर कमिटी के को चेयर डॉ. धर्मींदर नागर का कहना है कि दवा प्रोडक्शन में देश को आत्मनिर्भर बनाने की सरकार की पहल स्वागतयोग्य है. इससे रेयर ऑटोइम्युन डिजीज बीमारियों का इलाज सस्ता हो सकेगा. जैव-फार्मा मैन्युफैक्चरिंग में नया इकोसिस्टम बन सकेगा जिससे न केवल डायबिटीज और ऑटोइम्यून बीमारियों के लिए शोध और उत्पादन तेज होगा बल्कि वैश्विक रुप से हमारा अहम योगदान होगा.
बजट खर्च न होना बड़ी चिंता
सरकार द्वारा उठाए गए कदम निश्चित रूप से कुछ बुनियादी परिवर्तन लाएगा लेकिन असल समस्या नीतियों के क्रियान्वयन की है. हेल्थ के लिए इस बार बजट में 1,06,530 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है. यह पिछले साल की तुलना में 9 प्रतिशत अधिक है. सरकार ने नॉन कम्युनिकेबल डिजीज यानी मोटापा, डायबिटीज, हाई बीपी, कोलेस्ट्रॉल, कैंसर जैसी बीमारियों की दवाइयों की कीमत कम की है. इसके साथ ही देश को फार्मास्युटिकल हब बनाने के लिए कई तरह की घोषणाएं की गई है. पर असली सवाल यह है कि क्या भारत अपने इस बढ़े हुए हेल्थ बजट से अपनी सेहत सुधार सकेगा. अगर देखा जाए तो हमने हेल्थ सेक्टर में कई तरह की तरक्कियां की है. लेकिन अब भी इसमें समावेशी हेल्थ सेक्टर की दरकार है. हेल्थ सेक्टर में आज भी जो बजट आवंटित किया जाता है वह पूरी तरह से खर्च नहीं हो पाता है. 2025-26 में सरकार ने हेल्थ में 100,858 लाख करोड़ का बजट रखा था जिसे बाद में संशोधित कर 96,853 करोड़ कर दिया गया. पर हकीकत यह है कि इतना भी खर्च नहीं हो सका. सरकार पिछले वित्त वर्ष में सिर्फ 65.7 हजार करोड़ रुपये ही खर्च कर पाई. इस तरह बजट खर्च न होना चिंता का विषय है.
नॉन-कम्युनिकेबल डिजीज पर अंकुश जरूरी
जहां तक नॉन-कम्युनिकेबल डिजीज की बात है तो एक समय जहां भारत हैजा, टीबी, मलेरिया, कुष्ठ, पॉक्स, पोलियो जैसी संक्रामक बीमारियों से ग्रस्त था आज इसकी जगह नॉन कम्युनिकेबल डिजीज ने ली है. लगभग 25 प्रतिशत वयस्क किसी न किसी रुप में मोटापे के शिकार हैं. वहीं हर चार में से एक वयस्क या तो हाई ब्लड प्रेशर से जूझ रहे हैं या डायबिटीज से. हमें नॉन-कम्युनिकेबल बीमारियों ने चारों तरफ से घेर लिया है. आज जितनी मौतें होती है उनमें 63 प्रतिशत मौतें नॉन-कम्युनिकेबल डिजीज के कारण होती है जिनमें से अधिकांश को बचाया जा सकता था. सरकार ने इन बीमारियों की दवाइयों को सस्ता करने की कोशिश की है लेकिन असल समस्या यह है कि अधिकांश लोग समझ ही नहीं पाते हैं कि मोटापा, डायबिटीज या हाई ब्लड प्रेशर कोई बीमारी है. यही कारण है कि आए दिन अक्सर हार्ट अटैक या कार्डिएक अरेस्ट के मामले सामने आते रहते हैं. इन सबके लिए बजट से कहीं ज्यादा समग्र नीति बनाने की जरूरत है. प्राइमरी हेल्थ सेंटर के स्तर से ही हमें इन बीमारियों के लिए प्रिवेंटिव सर्विस की शुरुआत करनी होगी. साथ ही दूर-दराजों के इलाकों में हेल्थ कैंप लगाकर इसकी निगरानी करने की व्यवस्था करनी होगी.
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18 साल से पत्रकारिता जगत का एक विश्वसनीय चेहरा। लक्ष्मी नारायण ने अपने लंबे करियर में डीडी न्यूज, आउटलुक, नई दुनिया, दैनिक जागरण, हिन्दुस्तान जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं। समसामयिक के विभिन्…और पढ़ें