पंजाब के बरनाला जिले स्थित एक गांव में 18 वर्षीय युवक अपनी मेहनत से एक बड़ी मिसाल बन चुका है. 18 साल की उम्र में जहां ज्यादातर किशोर अपने करियर को लेकर सोच रहे होते हैं. कोई मेडिकल-इंजीनियर की पढ़ाई तो कोई IELTS करके विदेश जाने के सपने बुन रहा होता है, वहीं सेहना गांव के सोहलप्रीत सिंह सिद्धू ने इतनी कम उम्र में डेयरी फार्मिंग को न सिर्फ अपना करियर बनाया, बल्कि इससे हर महीने 5 से 6 लाख रुपये की कमाई भी शुरू कर दी है.
इंडियन एक्सप्रेस में छपी रिपोर्ट के मुताबिक, जनवरी 2026 में 18 साल के हुए सोहलप्रीत विदेश में पढ़ाई या नौकरी का सपना नहीं देखते. उनका साफ कहना है कि माता-पिता का पैसा विदेश भेजने में खर्च करने के बजाय, उसी पैसे को अपने कारोबार में लगाना बेहतर है. सोहलप्रीत ने ओपन स्कूलिंग से 12वीं पास की है और अब वेटरनरी कोर्स में दाखिला लेने की तैयारी कर रहे हैं. उनका मानना है कि बड़े स्तर पर डेयरी चलाने के लिए अनुभव के साथ-साथ पढ़ाई भी जरूरी है.
15 साल में खरीदी सवा लाख की पहली भेंस
सोहलप्रीत का यह सफर 15 साल की उम्र में शुरू हुआ, जब उन्होंने परिवार को पहली भैंस खरीदने के लिए मनाया. अगस्त 2023 में 1.20 लाख रुपये में पहली भैंस खरीदी गई. उस समय परिवार के पास पहले से चार-पांच भैंसें थीं, लेकिन डेयरी छोटे स्तर पर ही थी. पहली भैंस के बाद सोहलप्रीत ने खुद डेयरी की जिम्मेदारी संभाल ली और जो भी कमाई हुई, उसे पूरी तरह दोबारा मवेशी खरीदने में लगा दिया.
आज करीब तीन साल के भीतर सोहलप्रीत के पास लगभग 120 पशु हैं. इनमें 55 भैंसें, 15 गायें और करीब 50 बछड़े शामिल हैं. उनकी डेयरी में मुर्रा नस्ल की 53 भैंसें, नीली-रावी नस्ल की दो भैंसें, 12 होल्स्टीन फ्रिज़ियन (HF) गायें, दो जर्सी गायें और एक साहीवाल गाय शामिल हैं. फिलहाल 50 से 55 पशु दूध दे रहे हैं, जबकि 15 से 20 पशु गर्भवती हैं. सोहलप्रीत का लक्ष्य है कि अगले साल तक करीब 100 पशु दूध देने लगें और भविष्य में 500–550 भैंसों तक डेयरी को पहुंचाया जाए.
हर महीने 10 लाख की दूध बेचते हैं सोहलप्रीत
डेयरी से रोजाना 650 से 700 लीटर दूध का उत्पादन हो रहा है, जिसे बरनाला में एक निजी कंपनी के कलेक्शन सेंटर पर बेचा जाता है. भैंस का दूध 65–70 रुपये प्रति किलो और गाय का दूध 38–42 रुपये प्रति किलो के भाव बिकता है. रोजाना करीब 400 किलो भैंस का दूध बेचा जाता है. इससे महीने की कुल बिक्री लगभग 10 लाख रुपये तक पहुंच जाती है, जिसमें से करीब 60 फीसदी मुनाफा रहता है.
सोहलप्रीत बताते हैं कि इस मुनाफे का लगभग पूरा हिस्सा दोबारा डेयरी में ही लगाया जाता है. फिलहाल डेयरी में छह मजदूर काम करते हैं और हाथ से व मशीनों से मिल्किंग की जाती है. रोजाना दूध निकालने में करीब तीन घंटे लगते हैं. उनका कहना है कि अगर पशुओं की सही देखभाल की जाए तो दवाइयों पर खर्च बहुत कम आता है. चारे का बड़ा हिस्सा खुद की जमीन पर उगाया जाता है, जिससे लागत और घट जाती है.
एक एकड़ में फैला डेयरी फार्म
परिवार के पास कुल 20 एकड़ जमीन है और 22 एकड़ जमीन लीज पर ली गई है. डेयरी फार्म करीब एक एकड़ में फैला है, जिसे हर साल वैज्ञानिक तरीके से बढ़ाया जा रहा है. अलग-अलग फीडिंग एरिया, सही शेड और भैंसों के नहलाने के लिए पानी के कुंड बनाए गए हैं. इसके अलावा परिवार गेहूं, धान, मक्का और चारे की फसलें भी उगाता है. करीब 4.5 एकड़ जमीन सिर्फ चारे के लिए आरक्षित है. बरसीन, जौ, मक्का, चरी और बाजरा जैसे चारे की फसलें उगाई जाती हैं और साइलैज भी घर पर ही तैयार किया जाता है.
सिर्फ फायदा नहीं, नुकसान भी हुआ
सोहलप्रीत के पिता बलबीर सिंह सिद्धू कहते हैं कि शुरुआत में परिवार को संदेह था, लेकिन बेटे के जुनून ने उन्हें भरोसा दिलाया. वहीं दादा निशान सिंह सिद्धू के मुताबिक, सोहलप्रीत की तरक्की पूरे परिवार के लिए गर्व की बात है. हालांकि इस सफर में नुकसान भी हुए. सोहलप्रीत बताते हैं कि शुरुआत में कुछ गलत नस्ल की भैंसें खरीद ली थीं, जिससे घाटा हुआ, लेकिन उन्हीं गलतियों से सीख मिली. उनका मानना है कि बिजनेस में सफल होने के लिए हर काम खुद करना और हर बारीकी समझना जरूरी है.
सोहलप्रीत कहते हैं, ‘डेयरी मेरे लिए बोझ नहीं, मेरा शौक है. मैं पंजाब छोड़कर नहीं जाना चाहता. मेरा भविष्य यहीं है.’ आज उनकी यह सोच न सिर्फ एक सफल कारोबार में बदल चुकी है, बल्कि ग्रामीण पंजाब के युवाओं के लिए एक नई प्रेरणा भी बन गई है.
.