भोपाल. चंबल की वे घाटियां, जहां कभी डाकुओं के खौफ से रातें काली होती थीं, जहां SLR और LMG की आवाजें घने बीहड़ों में गूंजती थीं; उन्हीं लम्हों को पूरी स्पष्टता के साथ बयान करने वाले शख्स की उम्र आज 100 साल है. मध्य प्रदेश के पूर्व डीजीपी हरिवल्लभ मोहनलाल जोशी, जिन्होंने 5 मार्च 1926 को राजस्थान की किशनगढ़ रियासत के रलावता गांव में पहली सांस ली थी, आज भी उतनी ही तेज याददाश्त और दृढ़ आवाज के साथ उन ऑपरेशनों की तफसील सुनाते हैं जो दशकों पहले चंबल के बीहड़ों में अंजाम दिए गए थे. वे न तो हथियारों के नाम भूले हैं, न साल, न इलाका और न ही उस इन्फॉर्मर का मकसद जिसने जगमोहन गैंग के सफाए की नींव रखी.
माना जाता है कि हरिवल्लभ जोशी भारत के पहले इंडियन पुलिस सर्विस (IPS) बैच 1948 के आखिरी जीवित अधिकारी हैं. वह 39 अफसरों का एक ऐतिहासिक समूह था, जिसने स्वतंत्र भारत में औपनिवेशिक दौर की इंपीरियल पुलिस की जगह ली थी. आजादी के बाद नए राष्ट्र की पुलिस व्यवस्था की नींव रखने वाले उस बैच में शपथ लेने के लगभग आठ दशक बाद भी जोशी अपने पैरों पर चलते हैं, बिना किसी की मदद के खाना खाते हैं और अपने अनुभवों को उसी अधिकार से सुनाते हैं, जैसे किसी जंग के मैदान में हुकुम दिया जाता हो. उनके गले में लटकी एक छोटी सी सीटी इस बात की गवाह है कि शरीर भले ही सौ साल का हो, इरादे अभी भी फौलाद के हैं.
चंबल के डकैतों के खिलाफ मोर्चा
13 मई 1969 को जब जोशी ने ग्वालियर में DIG के तौर पर पदभार संभाला, तब ग्वालियर रेंज के सात जिले डकैतों के आतंक से बुरी तरह जकड़े हुए थे. उनसे पहले के अधिकारी जगमोहन गैंग के खिलाफ कई ऑपरेशन चला चुके थे, लेकिन हर बार नाकामी हाथ लगी. जोशी ने सबसे पहले विफलता की जड़ तलाशी. जल्द ही एक इन्फॉर्मर से मुलाकात हुई जो जगमोहन को खत्म करवाना चाहता था, क्योंकि उस डाकू ने उसकी बहन के साथ दुर्व्यवहार किया था. इन्फॉर्मर ने एक अहम राज उजागर किया: भिंड और मुरैना के SP के बीच तालमेल की कमी डकैतों की सबसे बड़ी ताकत थी. जब भिंड में कार्रवाई होती, डाकू मुरैना में जा छिपते और जब मुरैना में ऑपरेशन चलता, वे वापस भिंड की ओर खिसक जाते.
तालमेल बना खात्मे का हथियार
जोशी ने दोनों जिलों के SP को विश्वास में लेकर आपसी सहयोग वाली रणनीति तैयार की. दोनों तरफ से एक साथ जाल बिछाया गया. नतीजा चौंकाने वाला था; जगमोहन तोमर समेत 17 डकैत एक ही ऑपरेशन में मारे गए. यह चंबल के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ था. इसी दौरान डाकू छोटा नत्थू के खिलाफ अभियान में एक यादगार पल आया. जब छोटा नत्थू ने अपनी SLR उठाई, उसी क्षण कांस्टेबल आत्माराम ने LMG से फायर कर दिया. यह वाकया जोशी की आंखों में आज भी उतना ही जीवंत है.
हथियार और रणनीति का नया अध्याय
जोशी ने सिर्फ ऑपरेशन नहीं चलाए, बल्कि पुलिस की संरचना को भी मजबूत किया. उन्होंने सेक्शन स्तर पर LMG की तैनाती को मंजूरी दी, जिससे स्पेशल आर्म्ड फोर्स (SAF) यूनिट्स की मारक क्षमता कई गुना बढ़ गई. बीहड़ों की गहरी जानकारी रखने वाले सहरिया आदिवासियों को मुखबिर और गाइड के तौर पर शामिल किया गया. गांव स्तर पर डिफेंस कमेटियां बनाई गईं, जिससे स्थानीय लोग भी अपनी सुरक्षा में भागीदार बने.
राष्ट्रपति पुलिस एवं अग्नि सेवा पदक और पुलिस मेडल से सम्मानित
उनकी वीरता और कुशल नेतृत्व के लिए उन्हें राष्ट्रपति पुलिस एवं अग्नि सेवा पदक और मेरिटोरियस सर्विस के लिए पुलिस पदक से सम्मानित किया गया. जोशी ने अकोला से BA, इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्ययन और 1948 में नागपुर के मॉरिस कॉलेज से अंग्रेजी में MA किया. छात्र जीवन में उन्होंने लोकमत और कृषक पत्रिका में काम किया और IPS से पहले कुछ समय लेक्चरर भी रहे.
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